तो खु़दा तुम्हारी कारगुज़ारियों को दुरूस्त कर देगा और तुम्हारे गुनाह
बख़्श देगा और जिस शख़्स ने खु़दा और उसके रसूल की इताअत की वह तो अपनी
मुराद को खू़ब अच्छी तरह पहुँच गया (71)
बेशक हमने (रोज़े अज़ल) अपनी अमानत (इताअत इबादत) को सारे आसमान और ज़मीन
पहाड़ों के सामने पेश किया तो उन्होंने उसके (बार) उठाने से इन्कार किया
और उससे डर गए और आदमी ने उसे (बे ताम्मुल) उठा लिया बेशक इन्सान (अपने हक़
में) बड़ा ज़ालिम (और) नादान है (72)
इसका नतीजा यह हुआ कि खु़दा मुनाफिक़ मर्दों और मुनाफिक़ औरतों और मुशरिक
मर्दों और मुशरिक औरतों को (उनके किए की) सज़ा देगा और ईमानदार मर्दों और
ईमानदार औरतों की (तक़सीर अमानत की) तौबा क़ुबूल फरमाएगा और खु़दा तो बड़ा
बख़शने वाला मेहरबान है (73)
सूरए अल अहज़ाब ख़त्म

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
दोस्तों, कुछ गिले-शिकवे और कुछ सुझाव भी देते जाओ. जनाब! मेरा यह ब्लॉग आप सभी भाईयों का अपना ब्लॉग है. इसमें आपका स्वागत है. इसकी गलतियों (दोषों व कमियों) को सुधारने के लिए मेहरबानी करके मुझे सुझाव दें. मैं आपका आभारी रहूँगा. अख्तर खान "अकेला" कोटा(राजस्थान)