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15 जनवरी 2026

इम्तहां हर मोड़ पर पहले मेरा लिक्खा गया,

 

इम्तहां हर मोड़ पर पहले मेरा लिक्खा गया,
बाद में फिर नाम मेरा बेवफ़ा लिक्खा गया,
सर उठाना भी मेरा अक्सर ख़ता लिक्खा गया,
मेरी खु़द्दारी को भी मेरी अना लिक्खा गया,
क़त्ल कर के जब न छूटा उन के हाथों से ये रंग,
फिर हमारे ख़ून को रंगे-हिना लिक्खा गया,
जान अपनी लेे के बेचारा फिरे है दर ब दर,
जिसके राशन कार्ड में उसको मरा लिक्खा गया,
दे के सब कुछ ले लिया क़िस्मत ने इस अंदाज़ से,
इक जो मेरा था वही मुझसे जुदा लिक्खा गया,
सच को झूठा, झूठ को सच कर दिया अख़बार ने,
मैंने क्या बोला था लेकिन क्या से क्या लिक्खा गया,
जब तेरी सूरत से बचने की न कुछ सूरत हुई,
फिर तेरी तस्वीर को ही आइना लिक्खा गया,
उस सुख़़न की फिर हिमायत मैं भला क्यों कर करूं
बादशाहों को फ़क़त जिसमें खु़दा लिक्खा गया
कब किसी के वास्ते दुनिया ने इक सी बात की
बारहा, मुझको भला, मुझको बुरा लिक्खा गया
जावेद उल्फ़त

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