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09 दिसंबर 2025

राजस्थान पुलिस खासकर कोटा पुलिस की पीठ दिखाते हुए अखबार में छपी यह तस्वीर, क्यों है, किसलिए है, कब की है

 

राजस्थान पुलिस खासकर कोटा पुलिस की पीठ दिखाते हुए अखबार में छपी यह तस्वीर, क्यों है, किसलिए है, कब की है , कहाँ की है, किस आदेश से हैं, कुल पत्रकारिता के 6 क सिद्धांत , कब , क्यों , कहाँ, किसलिये, किसने , क्यों, का कोई जवाब नहीं है, खबर है, के पीठ वाले यह आदेश परिजनों की सुरक्षा की दृष्टि से हैं और ऐसी तस्वीर के आदेश है, पुलिस नियम, अधिनियम, खासकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, पुलिस अधिनियम 1961 वगेरा वगेरा के प्रावधान में यह सब तो नहीं है, पुलिस मुल्ज़िम को पकड़ती है, फोटो सेशन होता है, परेड होती है, मुल्ज़िम की टूट फूट हो जाये तो उसकी मरहम पट्टी, मरम्मत, प्लास्टर के साथ इलाज होता है, लँगड़ी टांग के फोटो वीडियो होते है, अखबार की प्रमुख खबर होते है, कल्पना कीजिये पहले तो पुलिस की नफरी कम , फिर कम पुलिसकर्मियों की लिखा पढ़ी, मुल्ज़िम धर पकड़ के बाद इस फोटो सेशन, वीडियो वगेरा सेशन में भी टाइम खर्ची, तो फिर पुलिस इसमें भी तो थकती है, पुलिस नियम, पुलिस अनुशासन नियम, ड्यूटी नियम में पुलिस कर्मी, पुलिस अधिकारी प्रेस सम्पर्क से प्रतिबंधित है, कर्तव्यबद्धता प्राथमिकता है, फिर अगर इन फालतू चीजों को निकाल दें तो पुलिस कर्तव्य का काफी वक्त बच जाता है, इस बचे हुए वक़्त को क़ानून व्यवस्था, अभियुक्तों की धरपकड़, स्वस्थ अनुसंधान के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, पुलिस नियमों में आम जनता से मालाएं पहनना , कार्यक्रमों में जाना, गिफ्ट वगेरा लेना भी पाबंदी है, लेकिन एक खास किस्म के लोगों की टीम सुबह से शाम तक नियमित रूप से गिरोह बनाकर थानों, पुलिस ऑफिसों में जाकर पुलिस अधिकारियों, पुलिस कर्मियों की बर्थ डे सेलिब्रेट करते है, फूल, गुलदस्ते, मालाएं होती है, प्रतीक चिन्ह होते है, वक़्त तो इसमें भी बर्बाद होता है, फिर यह तस्वीरें रोज़मर्रा रुआब के साथ सोशल मीडिया एकाउंट पर अपलोड मिलती है, सेलिब्रेटिंग वीडियो अपलोड मिलते है, खेर पुलिस अनुशासन नियम के विरुद्ध यह सब हो रहा है, इन सबके परिणाम दुष्परिणाम सम्बंद्धों का दिखावा क्या कुछ नतीजे लाता है सब जानते है, कोटा में मुल्जिमों की फोटो ग्राफी, टूट फूट की लंगड़ाते हुए , हाथ टुनटा दिखाते हुए तस्वीरें होती , कभी पेदल परेड भी होती है, पुलिस की सोच रहती है इन सब से अपराधियों में खोफ आमजन में विश्वास पैदा करने की धारणा प्रबल होगी, जो लोगों के दिल में वैसे ही हैं, क्यूंकी रात रात भर जागकर यही पुलिस हमें सुरक्षित रखती है, कड़वा सच यही है, लेकिन पुलिस का कीमती वक़्त भी बर्बाद होता है, ओर इन सब के बाद भी अपराधियों के हौसले कम नहीं होते, चाक़ूबाज़ी, चोरियां, अपराध, धोखाधड़ी रोज़मर्रा के किस्से हैं, ऐसे में अगर पुलिस इस वक़्त को बचा कर क़ानून व्यवस्था, पुलिस बीट प्रणाली के तहत सूचना एकत्रीकरण, सूक्ष्म निगरानी, जैसे कामों में लगाये तो ओर भी बहुत कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं, अख़्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 9829086339

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