*दिल्ली की क्रूर, दिल दहला देने वाली घटना पर विशेष लेख*
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अपरिचित फिल्म में एक दिमाग हिलाने वाला सीन है। एक बिजली के खंभे में से लटकता तार सड़क पर गिरा हुआ था। उसी रोड पर पानी भरा हुआ था और गड्डे भी थे। बिजली कर्मचारी को किसी ने फोन किया तो वो शराब पीकर सो रहा था और उस दिन किसी महापुरुष की जयंती के कारण शराब के ठेके बंद रखने का भी आदेश था। उस रोड पर से एक बच्चों से भरी रिक्शा गुजर रही थी और गड्डे की वजह से एक छोटी बच्ची उस रिक्शा से सड़क पर भरे पानी में गिर जाती है और करंट से मर जाती है। उस लड़की का पिता कोर्ट में केस करता है कि ये दुर्घटना नहीं बल्कि हत्या है। बिजली पोल ठीक करने वाले ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। सड़क पर गड्ढा क्यों था? कौन इंजीनियर था? ठेकेदार कौन था? उस रोड पर पानी कैसे क्यों भर जाता है? सफाई कर्मचारी कौन है? उसका अधिकारी कौन है? उस इलाके का पार्षद कौन था? शराब की दुकान बंद रखने के बावजूद शराब कैसे बिक रही थी? पुलिस को क्यों जानकारी नहीं थी कि शराब का ठेका आज वाले दिन भी कैसे खुला है?
यानि यदि कोई सिस्टम खराब है तो नीचे से ऊपर तक सबकी जिम्मेदारी है और कोई एक भी अपनी जिम्मेदारी निभाए तो हादसा न हो।
जब नए साल के जश्न में दुनिया डूबी थी तो उसी रात देश की राजधानी दिल्ली में एक बुरी घटना घटी । नशे में धुत युवकों ने एक स्कूटी
सवार लड़की को टक्कर मारी और कई किलोमीटर तक कार से घसीटते हुए ले गए।
मृतक लड़की का नग्न शरीर सड़क पर पड़ा मिला। आरोपियों का कहना है कि तेज म्यूजिक चलने के कारण लड़की की बॉडी कार से घसीटती गई और उन्हें पता ही नहीं चला जबकि मीडिया का दावा है कि कार इतनी बड़ी नहीं कि कोई कार से अड़ा घसीटता हुआ जाए और मालूम न हो। टक्कर जान बूझकर मारी गई या देह शोषण का प्रयास था, ये सब जांच के बाद स्पष्ट होगा और हर बार की तरह इसमें इतने साल लग जाएंगे कि मामले में दिलचस्पी और फैसले में किसी की रुचि और ध्यान नहीं रह जाएगा। आरोपियों को सजा मिले या छुट जाएंगे, बाद की बात है
पर अपरिचित फिल्म के दृश्य की तरह यदि सिस्टम ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो लड़की जिंदा होती। मीडिया रिपोर्ट की माने तो लड़की गरीब है, पिता नहीं है और मां बीमार, भाई बहन छोटे हैं। लोगों की शादियों में छोटे मोटे डेकोरेशन आदि का काम करके पेट पालती है। हर हादसे की तरह एक ही अबूझ सवाल है कि हमारे देश में किसी की जान की कीमत इतनी सस्ती क्यों है? इंसानी जान की वैल्यू क्यों नहीं? कोई भी दारूबाज नशे में धुत किसी को भी टक्कर मार दे और बॉडी क्षत विक्षत कर दे? नए साल का मतलब दारू पीकर रात में हुडदंग करो? किसी को भी मार दो नशे में? तेज गाड़ी चलाने वालों पर पाबंदी क्यों नहीं होती? रात में कारों की चेकिंग क्यों नहीं होती? ठेकों और होटलों पर कार्यवाही क्यों नहीं होती? क्यों राजनीतिक साठगांठ से अवैध शराब के ठेके खुले हुए हैं? चाहे 31 दिसंबर ही क्यों न हो? देर रात म्यूजिक और शराब इस्तेमाल पर पाबंदी क्यों नहीं होती? मस्ती करने का मतलब किसी गरीब की जान ले ली जाए? नियम विरुद्ध या तेज गाड़ी चलाने वालों को रोका जाए तो तुरंत किसी नेता से फोन पर पुलिस वाले को धमकी दिलवा दी जाती है और पुलिस वाला भी सोचता है कि छोड़ो, मैं क्यों पंगा लूं। गरीब रिक्शा वाले को गाली निकालता हवलदार किसी बड़ी गाड़ी को देखकर विनम्र हो जाता है क्योंकि वो भी मजबूर है। उसको भी नौकरी बचानी है। भ्रष्ट राजनीति और लचर सिस्टम की गड़बड़ या अनियमितता से कोई मासूम इनसान अपनी जान गंवा देता है। ये कैसा जनतंत्र है? वो निर्दोष लड़की अपने परिवार का पेट पाल रही थी, किसी का क्या बिगाड़ा था? लोग अपनी मौज मस्ती, दारू के शौक, बाहुबल, अप्रोच से किसी की भी जान लेने के दावेदार हो जाते है क्या? किसी त्योहार को मनाने का तरीका बस हुडदंग, हंगामा और दूसरों को पीड़ा देना ही है?
किसी के दिल में प्रेम नहीं, संवेदना नहीं, मानवता और इंसानियत नहीं।
सिर्फ स्वार्थ, दुष्टता और दरिंदगी दिल में
और क्रूरता को छुपाता मुखौटा।
लानत है..

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