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11 अक्तूबर 2020

मैं ज़रूर लौटुंगा।****

 

मैं ज़रूर लौटुंगा।****
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अशान्त समुद्र, तड़फती लहरें, कड़कती बिजलियां, घुप अंधेरा, मीलों पसरा सन्नाटा, शुष्क वायु, डरावनी आवाजें, अनजान भय से कांपता शरीर, रीढ़ तक दौड़ती सिरहन, जड़ होती सोच, कुन्द होती बुद्धि, धोंकनी सी चलती साँसे, निर्जीव होता शरीर, अनिष्ट की आशंकाऐं, सचमुच भयावह !
नैराष्य से लड़ने की अनन्त अनेकों असफल चेष्टाओं के बीच कुछ बचा हैं, शायद जीने की ललक, जो रह रहकर सुप्त होती चेतना व लुप्त होती संवेदओं के भंवर से निरन्तर विद्रोह कर रही हैं। प्रति क्षण टूटते साहस, निष्प्राण शरीरक्ष निरन्तर मंद होती सांसों व सुप्त धमनियों में लावा सा दौड़ने लगता है। प्राणतत्व, शिराओं में दौड़ने लगा। सहसा, नजरें टिक जाती है नैराष्य में भी शान से लहराते तिरंगे पर, याद आने लगता है वो मंजर, जब मैं आया था एक वादा करके अपने से, अपनों से। घर के आंगन में पथरायी आंखों से विदाई थी, घर के सितारे की। मां रो रोकर नसीहतें दे रही थी, बहन मुझसे लिपट कर सुबक रही थी, पत्नी सिसक रही थी दहलीज पर दरवाज़े से सटकर, भाई बहादुर बना हुआ था और स्टेशन तक आया था बाबूजी के साथ, बाबूजी असफल रुलाई रोक रहे थे, और मेरी नन्हीं गुडिया सबकुछ से अनजान मेरी पेन्ट खींचकर मेरी गोदी में आने की चेष्टा कर रही थी। आह! सबकुछ याद है मुझे।
एक बिजली सी दौड़ने लगी शरीर में, सहसा ही मैं बलशाली महसूस करने लगा और बहदवास सा दौड़ने लगा लाशों के बीच, बुदबुदाने लगा मुझे जीना है अपने वतन के लिये, अपनों के लिये।
सहसा, एक अज्ञात गोली ने मेरा सफर खत्म कर दिया।
जय हिन्द।
मैं लौटूंगा, जरुर लौटुंगा अपने वतन के लिये, अपनों के लिये, हर बार होली, दीवाली, ईद और बैसाखी पर ।
--महेश---

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