फिर जब दोनों ने ये ठान ली और बाप ने बेटे को (जि़बाह करने के लिए) माथे के बल लिटाया (103)
और हमने (आमादा देखकर) आवाज़ दी ऐ इबराहीम (104)
तुमने अपने ख़्वाब को सच कर दिखाया अब तुम दोनों को बड़े मरतबे मिलेगें हम नेकी करने वालों को यूँ जज़ाए ख़ैर देते हैं (105)
इसमें शक नहीं कि ये यक़ीनी बड़ा सख़्त और सरीही इम्तिहान था (106)
और हमने इस्माईल का फि़दया एक जि़बाहे अज़ीम (बड़ी कु़र्बानी) क़रार दिया (107)
और हमने उनका अच्छा चर्चा बाद को आने वालों में बाक़ी रखा है (108)
कि (सारी खु़दायी में) इबराहीम पर सलाम (ही सलाम) हैं (109)
हम यूँ नेकी करने वालों को जज़ाए ख़ैर देते हैं (110)
बेशक इबराहीम हमारे (ख़ास) ईमानदार बन्दों में थे (111)
और हमने इबराहीम को इसहाक़ (के पैदा होने की) खु़शख़बरी दी थी (112)
जो एक नेकोसार नबी थे और हमने खु़द इबराहीम पर और इसहाक़ पर अपनी बरकत नाजि़ल की और इन दोनों की नस्ल में बाज़ तो नेकोकार और बाज़ (नाफरमानी करके) अपनी जान पर सरीही सितम ढ़ाने वाला (113)
और हमने मूसा और हारून पर बहुत से एहसानात किए हैं (114)
और खु़द दोनों को और इनकी क़ौम को बड़ी (सख़्त) मुसीबत से नजात दी (115)
और (फिरऔन के मुक़ाबले में) हमने उनकी मदद की तो (आखि़र) यही लोग ग़ालिब रहे (116)
और हमने उन दोनों को एक वाज़ेए उलम तालिब किताब (तौरेत) अता की (117)
और दोनों को सीधी राह की हिदायत फ़रमाई (118)
और बाद को आने वालों में उनका जि़क्रे ख़ैर बाक़ी रखा (119)
कि (हर जगह) मूसा और हारून पर सलाम (ही सलाम) है (120)
हम नेकी करने वालों को यूँ जज़ाए ख़ैर अता फरमाते हैं (121)
बेशक ये दोनों हमारे (ख़ालिस ईमानदार बन्दों में से थे) (122)
और इसमें शक नहीं कि इलियास यक़ीनन पैग़म्बरों में से थे (123)
जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि तुम लोग (ख़ुदा से) क्यों नहीं डरते (124)
क्या तुम लोग बाल (बुत) की परसतिश करते हो और खु़दा को छोड़े बैठे हो जो सबसे बेहतर पैदा करने वाला है (125)
और (जो) तुम्हारा परवरदिगार और तुम्हारे अगले बाप दादाओं का (भी) परवरदिगार है (126)
तो उसे लोगों ने झुठला दिया तो ये लोग यक़ीनन (जहन्नुम) में गिरफ्तार किए जाएँगे (127)
मगर खु़दा के निरे खरे बन्दे महफूज़ रहेंगे (128)
और हमने उनका जि़क्र ख़ैर बाद को आने वालों में बाक़ी रखा (129)
कि (हर तरफ से) आले यासीन पर सलाम (ही सलाम) है (130)
हम यक़ीनन नेकी करने वालों को ऐसा ही बदला दिया करते हैं (131)
बेशक वह हमारे (ख़ालिस) ईमानदार बन्दों में थे (132)
और इसमें भी शक नहीं कि लूत यक़ीनी पैग़म्बरों में से थे (133)
जब हमने उनको और उनके लड़के वालों सब को नजात दी (134)
मगर एक (उनकी) बूढ़ी बीबी जो पीछे रह जाने वालों ही में थीं (135)
फिर हमने बाक़ी लोगों को तबाह व बर्बाद कर दिया (136)
और ऐ एहले मक्का तुम लोग भी उन पर से (कभी) सुबह को और (कभी) शाम को (आते जाते गुज़रते हो) (137)
तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते (138)
और इसमें शक नहीं कि यूनुस (भी) पैग़म्बरों में से थे (139)
(वह वक़्त याद करो) जब यूनुस भाग कर एक भरी हुयी कश्ती के पास पहुँचे (140)
तो (एहले कश्ती ने) कु़रआ डाला तो (उनका ही नाम निकला) यूनुस ने ज़क उठायी (और दरिया में गिर पड़े) (141)
तो उनको एक मछली निगल गयी और यूनुस खु़द (अपनी) मलामत कर रहे थे (142)
फिर अगर यूनुस (खु़दा की) तसबीह (व जि़क्र) न करते (143)
तो रोज़े क़यामत तक मछली के पेट में रहते (144)
फिर हमने उनको (मछली के पेट से निकाल कर) एक खुले मैदान में डाल दिया (145)
और (वह थोड़ी देर में) बीमार निढाल हो गए थे और हमने उन पर साये के लिए एक कद्दू का दरख़्त उगा दिया (146)
और (इसके बाद) हमने एक लाख बल्कि (एक हिसाब से) ज़्यादा आदमियों की तरफ (पैग़म्बर बना कर भेजा) (147)
तो वह लोग (उन पर) इमान लाए फिर हमने (भी) एक ख़ास वक़्त तक उनको चैन से रखा (148)
तो (ऐ रसूल) उन कुफ़्फ़ार से पूछो कि क्या तुम्हारे परवरदिगार के लिए बेटियाँ हैं और उनके लिए बेटे (149)
(क्या वाक़ई) हमने फरिश्तों की औरतें बनाया है और ये लोग (उस वक़्त) मौजूद थे (150)
ख़बरदार (याद रखो कि) ये लोग यक़ीनन अपने दिल से गढ़-गढ़ के कहते हैं कि खु़दा औलाद वाला है (151)
और ये लोग यक़ीनी झूठे हैं (152)
क्या खु़दा ने (अपने लिए) बेटियों को बेटों पर तरजीह दी है (153)
(अरे कम्बख्तों) तुम्हें क्या जुनून हो गया है तुम लोग (बैठे-बैठे) कैसा फैसला करते हो (154)
तो क्या तुम (इतना भी) ग़ौर नहीं करते (155)
या तुम्हारे पास (इसकी) कोई वाज़ेए व रौशन दलील है (156)
तो अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो अपनी किताब पेश करो (157)
और उन लोगों ने खु़दा और जिन्नात के दरम्यिान रिश्ता नाता मुक़र्रर किया है हालाँकि जिन्नात बखू़बी जानते हैं कि वह लोग यक़ीनी (क़यामत में बन्दों की तरह) हाजि़र किए जाएँगे (158)
ये लोग जो बातें बनाया करते हैं इनसे खु़दा पाक साफ़ है (159)
मगर खु़दा के निरे खरे बन्दे (ऐसा नहीं कहते) (160)
ग़रज़ तुम लोग खु़द और तुम्हारे माबूद (161)
उसके खि़लाफ (किसी को) बहका नहीं सकते (162)
मगर उसको जो जहन्नुम में झोंका जाने वाला है (163)
और फरिश्ते या आइम्मा तो ये कहते हैं कि मैं हर एक का एक दरजा मुक़र्रर है (164)
और हम तो यक़ीनन (उसकी इबादत के लिए) सफ बाँधे खड़े रहते हैं (165)
और हम तो यक़ीनी (उसकी) तस्बीह पढ़ा करते हैं (166)
अगरचे ये कुफ्फार (इस्लाम के क़ब्ल) कहा करते थे (167)
कि अगर हमारे पास भी अगले लोगों का तज़किरा (किसी किताबे खु़दा में) होता (168)
तो हम भी खु़दा के निरे खरे बन्दे ज़रूर हो जाते (169)
(मगर जब किताब आयी) तो उन लोगों ने उससे इन्कार किया ख़ैर अनक़रीब (उसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा (170)
और अपने ख़ास बन्दों पैग़म्बरों से हमारी बात पक्की हो चुकी है (171)
कि इन लोगों की (हमारी बारगाह से) यक़ीनी मदद की जाएगी (172)
और हमारा लश्कर तो यक़ीनन ग़ालिब रहेगा (173)
सूल) तुम उनसे एक ख़ास वक़्तो (ऐ रत तक मुँह फेरे रहो (174)
और इनको देखते रहो तो ये लोग अनक़रीब ही (अपना नतीजा) देख लेगे (175)
तो क्या ये लोग हमारे अज़ाब की जल्दी कर रहे हैं (176)
फिर जब (अज़ाब) उनकी अंगनाई में उतर पडे़गा तो जो लोग डराए जा चुके हैं उनकी भी क्या बुरी सुबह होगी (177)
और उन लोगों से एक ख़ास वक़्त रहो तक मुँह फेरे (178)
और देखते रहो ये लोग तो खु़द अनक़रीब ही अपना अन्जाम देख लेगें (179)
ये लोग जो बातें (खु़दा के बारे में) बनाया करते हैं उनसे तुम्हारा परवरदिगार इज़्ज़त का मालिक पाक साफ है (180)
और पैग़म्बरों पर (दुरूद) सलाम हो (181)
और कुल तारीफ खु़दा ही के लिए सज़ावार हैं जो सारे जहाँन का पालने वाला है (182)
सुरए अस साफ़्फ़ात ख़त्म
और हमने (आमादा देखकर) आवाज़ दी ऐ इबराहीम (104)
तुमने अपने ख़्वाब को सच कर दिखाया अब तुम दोनों को बड़े मरतबे मिलेगें हम नेकी करने वालों को यूँ जज़ाए ख़ैर देते हैं (105)
इसमें शक नहीं कि ये यक़ीनी बड़ा सख़्त और सरीही इम्तिहान था (106)
और हमने इस्माईल का फि़दया एक जि़बाहे अज़ीम (बड़ी कु़र्बानी) क़रार दिया (107)
और हमने उनका अच्छा चर्चा बाद को आने वालों में बाक़ी रखा है (108)
कि (सारी खु़दायी में) इबराहीम पर सलाम (ही सलाम) हैं (109)
हम यूँ नेकी करने वालों को जज़ाए ख़ैर देते हैं (110)
बेशक इबराहीम हमारे (ख़ास) ईमानदार बन्दों में थे (111)
और हमने इबराहीम को इसहाक़ (के पैदा होने की) खु़शख़बरी दी थी (112)
जो एक नेकोसार नबी थे और हमने खु़द इबराहीम पर और इसहाक़ पर अपनी बरकत नाजि़ल की और इन दोनों की नस्ल में बाज़ तो नेकोकार और बाज़ (नाफरमानी करके) अपनी जान पर सरीही सितम ढ़ाने वाला (113)
और हमने मूसा और हारून पर बहुत से एहसानात किए हैं (114)
और खु़द दोनों को और इनकी क़ौम को बड़ी (सख़्त) मुसीबत से नजात दी (115)
और (फिरऔन के मुक़ाबले में) हमने उनकी मदद की तो (आखि़र) यही लोग ग़ालिब रहे (116)
और हमने उन दोनों को एक वाज़ेए उलम तालिब किताब (तौरेत) अता की (117)
और दोनों को सीधी राह की हिदायत फ़रमाई (118)
और बाद को आने वालों में उनका जि़क्रे ख़ैर बाक़ी रखा (119)
कि (हर जगह) मूसा और हारून पर सलाम (ही सलाम) है (120)
हम नेकी करने वालों को यूँ जज़ाए ख़ैर अता फरमाते हैं (121)
बेशक ये दोनों हमारे (ख़ालिस ईमानदार बन्दों में से थे) (122)
और इसमें शक नहीं कि इलियास यक़ीनन पैग़म्बरों में से थे (123)
जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि तुम लोग (ख़ुदा से) क्यों नहीं डरते (124)
क्या तुम लोग बाल (बुत) की परसतिश करते हो और खु़दा को छोड़े बैठे हो जो सबसे बेहतर पैदा करने वाला है (125)
और (जो) तुम्हारा परवरदिगार और तुम्हारे अगले बाप दादाओं का (भी) परवरदिगार है (126)
तो उसे लोगों ने झुठला दिया तो ये लोग यक़ीनन (जहन्नुम) में गिरफ्तार किए जाएँगे (127)
मगर खु़दा के निरे खरे बन्दे महफूज़ रहेंगे (128)
और हमने उनका जि़क्र ख़ैर बाद को आने वालों में बाक़ी रखा (129)
कि (हर तरफ से) आले यासीन पर सलाम (ही सलाम) है (130)
हम यक़ीनन नेकी करने वालों को ऐसा ही बदला दिया करते हैं (131)
बेशक वह हमारे (ख़ालिस) ईमानदार बन्दों में थे (132)
और इसमें भी शक नहीं कि लूत यक़ीनी पैग़म्बरों में से थे (133)
जब हमने उनको और उनके लड़के वालों सब को नजात दी (134)
मगर एक (उनकी) बूढ़ी बीबी जो पीछे रह जाने वालों ही में थीं (135)
फिर हमने बाक़ी लोगों को तबाह व बर्बाद कर दिया (136)
और ऐ एहले मक्का तुम लोग भी उन पर से (कभी) सुबह को और (कभी) शाम को (आते जाते गुज़रते हो) (137)
तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते (138)
और इसमें शक नहीं कि यूनुस (भी) पैग़म्बरों में से थे (139)
(वह वक़्त याद करो) जब यूनुस भाग कर एक भरी हुयी कश्ती के पास पहुँचे (140)
तो (एहले कश्ती ने) कु़रआ डाला तो (उनका ही नाम निकला) यूनुस ने ज़क उठायी (और दरिया में गिर पड़े) (141)
तो उनको एक मछली निगल गयी और यूनुस खु़द (अपनी) मलामत कर रहे थे (142)
फिर अगर यूनुस (खु़दा की) तसबीह (व जि़क्र) न करते (143)
तो रोज़े क़यामत तक मछली के पेट में रहते (144)
फिर हमने उनको (मछली के पेट से निकाल कर) एक खुले मैदान में डाल दिया (145)
और (वह थोड़ी देर में) बीमार निढाल हो गए थे और हमने उन पर साये के लिए एक कद्दू का दरख़्त उगा दिया (146)
और (इसके बाद) हमने एक लाख बल्कि (एक हिसाब से) ज़्यादा आदमियों की तरफ (पैग़म्बर बना कर भेजा) (147)
तो वह लोग (उन पर) इमान लाए फिर हमने (भी) एक ख़ास वक़्त तक उनको चैन से रखा (148)
तो (ऐ रसूल) उन कुफ़्फ़ार से पूछो कि क्या तुम्हारे परवरदिगार के लिए बेटियाँ हैं और उनके लिए बेटे (149)
(क्या वाक़ई) हमने फरिश्तों की औरतें बनाया है और ये लोग (उस वक़्त) मौजूद थे (150)
ख़बरदार (याद रखो कि) ये लोग यक़ीनन अपने दिल से गढ़-गढ़ के कहते हैं कि खु़दा औलाद वाला है (151)
और ये लोग यक़ीनी झूठे हैं (152)
क्या खु़दा ने (अपने लिए) बेटियों को बेटों पर तरजीह दी है (153)
(अरे कम्बख्तों) तुम्हें क्या जुनून हो गया है तुम लोग (बैठे-बैठे) कैसा फैसला करते हो (154)
तो क्या तुम (इतना भी) ग़ौर नहीं करते (155)
या तुम्हारे पास (इसकी) कोई वाज़ेए व रौशन दलील है (156)
तो अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो अपनी किताब पेश करो (157)
और उन लोगों ने खु़दा और जिन्नात के दरम्यिान रिश्ता नाता मुक़र्रर किया है हालाँकि जिन्नात बखू़बी जानते हैं कि वह लोग यक़ीनी (क़यामत में बन्दों की तरह) हाजि़र किए जाएँगे (158)
ये लोग जो बातें बनाया करते हैं इनसे खु़दा पाक साफ़ है (159)
मगर खु़दा के निरे खरे बन्दे (ऐसा नहीं कहते) (160)
ग़रज़ तुम लोग खु़द और तुम्हारे माबूद (161)
उसके खि़लाफ (किसी को) बहका नहीं सकते (162)
मगर उसको जो जहन्नुम में झोंका जाने वाला है (163)
और फरिश्ते या आइम्मा तो ये कहते हैं कि मैं हर एक का एक दरजा मुक़र्रर है (164)
और हम तो यक़ीनन (उसकी इबादत के लिए) सफ बाँधे खड़े रहते हैं (165)
और हम तो यक़ीनी (उसकी) तस्बीह पढ़ा करते हैं (166)
अगरचे ये कुफ्फार (इस्लाम के क़ब्ल) कहा करते थे (167)
कि अगर हमारे पास भी अगले लोगों का तज़किरा (किसी किताबे खु़दा में) होता (168)
तो हम भी खु़दा के निरे खरे बन्दे ज़रूर हो जाते (169)
(मगर जब किताब आयी) तो उन लोगों ने उससे इन्कार किया ख़ैर अनक़रीब (उसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा (170)
और अपने ख़ास बन्दों पैग़म्बरों से हमारी बात पक्की हो चुकी है (171)
कि इन लोगों की (हमारी बारगाह से) यक़ीनी मदद की जाएगी (172)
और हमारा लश्कर तो यक़ीनन ग़ालिब रहेगा (173)
सूल) तुम उनसे एक ख़ास वक़्तो (ऐ रत तक मुँह फेरे रहो (174)
और इनको देखते रहो तो ये लोग अनक़रीब ही (अपना नतीजा) देख लेगे (175)
तो क्या ये लोग हमारे अज़ाब की जल्दी कर रहे हैं (176)
फिर जब (अज़ाब) उनकी अंगनाई में उतर पडे़गा तो जो लोग डराए जा चुके हैं उनकी भी क्या बुरी सुबह होगी (177)
और उन लोगों से एक ख़ास वक़्त रहो तक मुँह फेरे (178)
और देखते रहो ये लोग तो खु़द अनक़रीब ही अपना अन्जाम देख लेगें (179)
ये लोग जो बातें (खु़दा के बारे में) बनाया करते हैं उनसे तुम्हारा परवरदिगार इज़्ज़त का मालिक पाक साफ है (180)
और पैग़म्बरों पर (दुरूद) सलाम हो (181)
और कुल तारीफ खु़दा ही के लिए सज़ावार हैं जो सारे जहाँन का पालने वाला है (182)
सुरए अस साफ़्फ़ात ख़त्म

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