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05 जुलाई 2018

कोटा सर्किट हाउस एक साल में दो गांधीवादी विचारकों की यादगार बन गया

कोटा सर्किट हाउस एक साल में दो गांधीवादी विचारकों की यादगार बन गया ,वैसे यहां गांधीवादी विचारक के प्रचारक अशोक गहलोत अक्सर आते जाते रहे है ,लेकिन उनकी वी आई पी व्यवस्थाओ के मामले को लेकर ,,उनके लिए गांधीवादिता का अध्ययन सम्भव से नहीं था ,फिर भी गांधीवादिता प्रचारक ,,,अपने आदर्श ,अपने आचरण से साबित करने वाले ,दो गाँधीवादी इसी साल इसी सर्किट हाउस में गवाह बने है ,,इत्तिफ़ाक़ से दोनों गाँधीवादी कोंग्रेसी ,,उत्तरप्रदेश के ही है ,,,एक कोटा में संगठन के निर्वाचक रहे है जिन्होंने ,निष्पक्षता ,,निर्भीकता ,बहुपक्षीय ,,गांधीवादिता से सभी को बिना किसी ,उपहार ,उपकार के सुनवाई कर न्याय करने का प्रयास किया ,,दूसरे हाल ही में क्रिकेट के विशेष धुआधार अंक वाले कमरे में ठहरे थे ,वोह अपने कपड़े रोज़ खुद धोते ,कपड़े कमरे पर ही सुखाते ,शुद्ध खादी पहनना उनकी आदत ,,सादगी उनकी पहचान ,,उनके नियमित रोज़ कपड़े धोकर सुखाने ,उन्ही कपड़ो को पहनने पर नज़र रखे हुए ,,कोटा के मेरे एक साथी जो उन गांधीवादी के पुराने परिचित थे ,उन्होंने पारिवारिक सदस्य होने के नाते यह समझ लिया के शायद यात्रा के दौरान यह कपड़े लाना भूल गए ,इसी लिए रोज़ मर्रा उन्हें यह मशक़्क़त करना पढ़ रही है ,बस इन जनाब ने दो जोड़ी खादी के सूट एक परिवार के नाते उन्हें गिफ्ट के रूप में देना चाहा ,,लेकिन उन्होंने बढ़ी विनम्रता से उन्हें समझाकर उक्त कपड़े वापस लोटा दिए ,,मेरे इस मित्र जो उनके पुराने जानकार थे उन्होंने फिर ,उनके कपड़े लॉन्ड्री में नियमित धुलवाने के लिए प्रस्ताव रखा ,,,लेकिन वह रे ,कांग्रेस के गांधीवादी विचारधारा समर्थक ,उन्होंने साफ़ कहा ,भाई में यह दिखावा ,या मजबूरी में नहीं कर रहा ,यह मेरा स्वभाव है ,अपने कपड़े में खुद धोकर अगर न पहन सकूं तो फिर ,ऐसी कांग्रेस ,ऐसी गांधीवादी विचारधारा का होने से क्या फायदा ,मेरे मित्र ने उन्हें फिर कहा ,साहिब दूसरे लोग भी तो लॉन्ड्री पर कपड़े धुलवा रहे है ,उन्होंने कहा उनका वोह जाने ,मेरा अपना स्वभाव है ,,मेरे अपने सिद्धांत है ,में अपने सिद्धांत किसी भी मजबूरी ,किसी भी हालत में बदल नहीं सकता ,,खेर उनके जाने की बारी थी ,जाने वाले को कोटा का नमकीन ,काजुकतली ,बच्चो के प्रसादम के लिए बतौर मेज़बानी गिफ्ट देने का प्रयास किया ,,लेकिन वाह रे गांधीवादी मेरे भाई ,,उन्होंने सभी मिठाई ,नमकीन अपने साथ नहीं रखा ,वहां उपस्थित सभी लोगो में मिल बाँट कर ,,मोहब्बत के पैगाम के साथ प्रसादम करवा दिया ,उनके रहने ,चलने ,उनके व्यवहार ,उनके बोलने ,,महमान होने पर भी मेज़बानों के साथ उनका जो खुलूस ,एडजस्टमेंट था ,कारों में बैठने को लेकर उनका जो एडजस्टमेंट था ,सही में गांधीवादी विचारक के रूप में सादगी भरा था ,और बस उनके इस व्यवहार को देखकर ,,उनकी शान में ,उनकी सादगी ,गांधीवादिता की शान में मुझे ,गहलोत तो याद आये ,लेकिन उत्तरप्रदेश के कोटा के निर्वाचक का व्यवहार भी मेरे लिए ताज़ा हो गया ,,काश ऐसे गांधी वादी ,जैसे हमारे कोटा में भी आदरणीय नरेश वियजयवर्गीय है ,,मुंग में सफेदी के बराबर भी अगर हो जाए ,तो देश का ,,हम जैसे कार्यकर्ताओं का तो उद्धार ही हो जाए ,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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