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17 जून 2018

हकीम खां सूर ने ही सिखाया था शिरस्त्राण पहनकर लड़ना

अकबर के खिलाफ युद्ध लड़ने वाले हकीम खां सूर के मजार क़ौमी एकता राष्ट्रीयता ,,वफ़ादारी ,सर कटाकर भी अपने राजा की हिफाज़त करने की सीख मिलती है ,,वही हकीम खां सूर, जिनके बिना हल्दी घाटी के युद्ध की कहानी अधूरी है। हकीम खां इस युद्ध में हर वक्त महाराणा प्रताप के साथ खड़े रहे। इतना ही नहीं, प्रताप की सेना को कई दांव-पेच भी सिखाए। दिलचस्प है मजार की कहानी...
युद्ध में जहां धड़ गिरा, वहीं बनाई गई समाधि
- मजार के बारे में यह प्रचलित है कि महाराणा और अकबर की सेना के बीच युद्ध के दौरान मेवाड़ के सेनापति हकीम खां सूर का सिर धड़ से अलग हो गया।
- बावजूद कुछ देर तक वे घोड़े पर योद्धा की तरह सवार रहे। कहते हैं कि मृत्यु के बाद हल्दी घाटी में जहां उनका धड़ गिरा। वहीं, समाधि बनाई गई।
- उन्हें अपनी तलवार के साथ ही दफनाया गया था। उन्हें पीर का दर्जा दिया गया।
- यहां मुस्लिम व हिंदू समुदाय के लोग मन्नत पूरी होने के मथा टेकते है।
- सिर जहां गिरा वहां एक स्थान (मजार) रक्त तलाई में स्थित है।
-यहां हर वर्ष 18 जून को मुस्लिम समाज के लोग कौमी एकता कमेटी के माध्यम से धार्मिक कार्यक्रम होते है।
हकीम के बारे में ये भी जानें
- हकीम खां सूर अफगानी मुस्लिम पठान थे। वे महाराणा प्रताप के तोपखाने के प्रमुख हुआ करते थे।
- हल्दी घाटी के युद्ध में अकबर की सेना के खिलाफ प्रताप की सेना के सेनापति के रूप में भी रहे।
- दूसरी ओर अकबर की तरफ से आमेर के राजा मान सिंह सेनापति रहे। जो आमेर के राजा थे।
- साम्प्रदायिक सौहार्द्र व आत्म स्वाभिमान के लिए महाराणा प्रताप की सेना में शामिल हुए।
पहले पहाड़ी पर थी मजार
हल्दी घाटी में वर्षों पहले यह मजार पहाड़ी पर थी। तब सड़क दो पहाड़ों के बीच से निकलती थी। उस परिदृश्य को परिवर्तित ऐतिहासिक दर्रे का स्वरूप दे दिया और सड़क के बाईं ओर की पहाड़ी काटकर नई सड़क बना दी गई। नई घुमावदार सड़क के ठीक शुरुआत में ही यह स्थान धरातल पर आ गया।महाराणा प्रताप के बहादुर सेनापति हकीम खां सूर के बिना हल्दीघाटी युद्ध का उल्लेख अधूरा है। 18 जून, 1576 की सुबह जब दोनों सेनाएं टकराईं तो प्रताप की ओर से अकबर की सेना को सबसे पहला जवाब हकीम खां सूर के नेतृत्व वाली टुकड़ी ने ही दिया।
महज 38 साल के इस युवा अफगानी पठान के नेतृत्व वाली सैन्य टुकड़ी ने अकबर के हरावल पर हमला करके पूरी मुगल सेना में आतंक की लहर दौड़ा दी। मुगल सेना की सबसे पहली टुकड़ी का मुखिया राजा लूणकरण आगे बढ़ा तो हकीम खां ने पहाड़ों से निकल कर अप्रत्याशित हमला किया।
मुगल सैनिक इस आक्रमण से घबराकर चार पांच कोस तक भयभीत भेड़ों के झुंड की तरह जान बचाकर भागे। यह सिर्फ किस्सागोई की बात नहीं है, अकबर की सेना के एक मुख्य सैनिक अलबदायूनी का लिखा तथ्य है, जो खुद हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के खिलाफ लड़ने के लिए आया था।हिन्दू-मुस्लिम
हल्दीघाटी के युद्ध के इतिहास के पन्नों पर एक दोहा बहुत
चर्चित है : अजां सुणी, मस्जिद गया, झालर सुण मंदरांह।
रणभेरी सुण राण री, मैं साथ गया समरांह। यानी अजान
सुनकर मुस्लिम मस्जिदों को गए और घंटियों की आवाजें
सुनकर हिंदू देवालयों में गए। लेकिन जैसे ही राणा ने युद्ध
भेरी बजवाई तो हम सभी मंदिरों और मस्जिदों से संग्राम
लड़ने के लिए मुगलों के खिलाफ एक हो गए।
हकीम खां सूर ने ही सिखाया था शिरस्त्राण पहनकर
लड़ना
कहते हैं, हल्दीघाटी युद्ध से कुछ समय पहले हकीम खां सूर
बिहार गया हुआ था और वह अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ
वहीं से लौटा था। हकीम खां युद्ध की लौहारी कलाओं
का ज्ञाता था और उसी ने मेवाड़ी सेना को खुद यानी
शिरस्त्राण पहनकर लड़ना सिखाया। इससे पहले मेवाड़ी
सेनाएं पगड़ी पहनकर लड़ा करती थीं। इतिहासविदों का
कहना है कि वह महाराणा उदयसिंह के समय से ही इस
परिवार के संपर्क में था, लेकिन महाराणा की युद्ध शैली,
शासन शैली और व्यक्तिगत गुणों ने उसे उनका मुरीद बना
दिया था। उन जैसे मरजीवड़ों से मेवाड़ का इतिहास महक
रहा है।

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