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17 फ़रवरी 2017

,उर्दू मातृ भाषा दिवस के रूप में मनाया जाएगा ,

तहरीक ऐ उर्दू राजस्थान के आह्वान पर ,,आगामी इक्कीस फरवरी को ,,उर्दू तहज़ीब ,,नवाबो की रियासत नगरी टोंक में विश्व मातृ भाषा दिवस के दिन ,,उर्दू मातृ भाषा दिवस के रूप में मनाया जाएगा ,,,,तहरीक ऐ उर्दू राजस्थान के सचिव खुर्शीद अहमद ने बताया के तहरीक के सरपरस्त क़ाज़ी ऐ शहर अनवार अहमद सहित तहरीक के सभी पदाधिकारियो की सहमति से यह आयोजन ,,उर्दू को फरोग देने ,,उर्दू को आम हिन्दुस्तानियो की जुबान बनाने के मक़सद से किया जा रहा है ,,खुर्शीद अहमद ने बताया के इक्कीस फरवरी को शाम बाद नमाज़ ईशा टोंक स्थित ख़लीलीया मदरसे में यह कार्यक्रम आयोजित होगा ,,जिसमे उर्दू के सभी हमदर्दो को बुलाया गया है ,,,,,,
सभी जानते है उर्दू हिन्दुस्तान के देशभक्त क्रांतिकारियों ,,साहित्यकारियों ,आज़ादी के आंदोलनकारियों ,,,तहज़ीब से जुड़े लोगो की ज़ुबान ह,,,भारत की आज़ादी के संग्राम को-उर्दु हिन्दुस्तान का आईना है , अब पूछिएगा कैसे ..? तो सुनिए घर क्या बंटा, बेटी अनजान बन गई,,मुल्क क्या बंटा, उर्दू मुसलमान हो गई,,,,उर्दू ही वह ज़ुबान है जिसने अंग्रेजों को सबसे पहले बुलंद आवाज में ललकारा और मौलाना मोहम्मद बाक़ीर को पैदा किया ,,,,मौलाना मोहम्मद बाक़ीर देश के पहले और शायद आखिरी पत्रकार थे, जिन्होंने 1857 में स्वाधीनता के पहले संग्राम में अपने प्राण की आहुति दी थी। मौलाना साहब अपने समय के बेहद निर्भीक पत्रकार रहे थे। वे उस दौर के लोकप्रिय ‘उर्दू अखबार दिल्ली’ के संपादक थे.दिल्ली और आसपास अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ जनमत तैयार करने में इस अखबार की बड़ी भूमिका रही थी। मौलाना साहब अपने अखबार में अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति के विरुद्ध और उनके खिलाफ लड़ रहे सेनानियों के पक्ष में लगातार लिखते रहे। अंग्रेजों ने उन्हें बड़ा ख़तरा मानकर गिरफ्तार किया और सज़ा-ए-मौत दे दी,,,, उन्हें तोप के मुंह पर बांध कर उडा दिया गया जिससे उनके वृद्ध शरीर के परखचे उड़ गए,,उर्दु ने ही बहादुर शाह ज़फ़र को अपनी गोद मे पाला जिन्होने हिन्दुस्तान की पहली जंगे आज़ादी मे हमारी क़ियादत की थी ,,उन्होंने कहा था गाज़ियों में बु रहेगी जब तक इमान की,,तब तो लंदन तक चलेगी तेग़ हिन्दुस्तान की.
नेताजी सुभाषचंद्र बोस उर्दू के अच्छे जानकार थे। बांग्ला उनकी मादरी ज़ुबान थी। वहीं, वे हिंदी, अंग्रेजी के अलावा उर्दू भी बोलते थे। आजाद हिंद फौज का नाम उर्दू से मुतास्सिर है। उसके नारों में उर्दू के अनेक लफज़ों का उपयोग किया गया है। आजादी के आंदोलन में उर्दू का महान योगदान है,, उर्दु ने ही मौलाना हसरत मोहानी को पैदा किया जिन्होने इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया। भगत सिंह और अनेक बलिदानी इंकलाब जिंदाबाद कहते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए।उर्दु ने ही बिसमिल अज़ीमाबादी को पाला जिन्होने ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है’ जैसी इंक़लाबी ग़ज़ल लिख दिया। राम प्रासाद बिसमिल और अनेक बलिदानी इस ग़ज़ल को गाते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए,,,राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ और अशफाक उल्ला खाँ भी बहुत अच्छे उर्दु शायर थे। इन दोनों की शायरी की अगर तुलना की जाये तो रत्ती भर का भी फर्क आपको नजर नहीं आयेगा,,इक़बाल का लिखा “तराना-ए-हिन्दी” तो याद होगा ही ??सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा,,,यानी पुरे विश्व से अच्छा हिंदुस्तान हमारा सिर्फ उर्दू ने ही कहने की हिम्मत की है यूनान – ओ- मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गये जहाँ से,,अब तक मगर है बाकी नाम – ओ- निशां हमारा,,कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,,,सदिओं रहा हैं दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा उर्दु ने ही पंडित बृज नारायण चकबस्त को पैदा किया जिसने अपनी इंक़लाबी गज़लो से अवाम मे एक नया जोश ड़ाल दिया ,,,उर्दु ने ही साहिर लुधानवी को अपनी गोद मे पाला जिसने अपनी इंक़लाबी गज़लो से नेताओं को आईना दिखाया और आम अवाम को बताया कि “ये किसका लहु है कौन मरा” … कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद उर्दू में भी लिखते थे। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत उर्दू से हुई,, उर्दु ने ही रघुपति सहाय को फ़राक़ गोरखपुरी बना दिया,,उर्दु ने ही कैफ़ी को कैफी आज़मी बनाया जिसने लिखा तो सबने पढ़ा,,कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं,,,सर हिमालय का हमने न झुकने दिया,,,उर्दु ने ही दुष्यंत कुमार को एक अलग मोक़ाम दिया और उनकी उर्दु मे लिखी एक ग़ज़ल ने पुरे ख़ित्ते मे इंक़लाब बर्पा कर दिया ,सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए,,मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,,,,हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।तो अब ठेठ मे सुनो कि उर्दु है क्या .?उर्दु सरफ़रशोँ की ज़ुबान है ..उर्दु इंक़लाब वालोँ की ज़ुबान है ..उर्दु ख़ुद्दारोँ की ज़ुबान है ..उर्दु शोहदाओँ की ज़ुबान है ..उर्दु हिन्दुसतान की ज़ुबान है ..पर अब भी ये मुसलमान की ज़ुबान नही है ..घर क्या बंटा, बेटी अनजान बन गई।मुल्क क्या बंटा, उर्दू मुसलमान हो गई।जब जब ज़ुल्म की इंतेहा होगी उर्दु अपना जलवा दिखाएगा . इंक़लाब लाएगा . चाहे इमरजेँसी के दौर मे कलीम आज़िज़ ही क्योँ ना हो .!आखि़र मे अकबर अलाहबादी की लिखी हुई ये दो लाईन के साथ फ़िलहील के लिए मै अपनी बात को ख़त्म करता हुं :-खींचो न कमानो को, न तलवार निकालो,,,जब तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो..लफ़्ज़े “उर्दू” चार हरुफ़ से मिल कर बना है…..अलिफ़,रे,दाल,वाओ,,अलिफ़ से अल्लाह,,रे से राम,,दाल से द गोड ,,वाओ से वाहे गुरुसब धर्मों को मिला कर जो ज़ुबान बनी वही “उर्दू” है।1969 में आगरा में ग़ालिब की देहांत शाताब्दी समारोह जश्न-इ- ग़ालिब पर साहिर लुधयानवी की पंक्तियाँ,,जिन शहरों में गूंजी थी ग़ालिब की नवा बरसों,,उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ- निशाँ ठहरी,,,आज़ादी-इ- कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन,,,मातूब जुबां ठहरी, ग़द्दार ज़ुबाह ठहरी “जिस अहद-इ- सियासत ने यह ज़िंदा जुबां कुचली,,उस अहद-इ-सियासत को मेहरूमों का ग़म क्यों है ?,,ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू का ही शायर था,,,उर्दू पर सितम ढा कर ग़ालिब पर करम क्यों है ? ”तो जनाब उर्दू फिल्मो की जुबां ,,साहित्य की ज़ुबान ,,आप जनाब तहज़ीब की जुबां ,,एक गद्दारो के लिए एक ललकार ,,दुश्मनो के लिए एक फटकार ,,दोस्तों के लिए हमदर्दी की जुबां है ,,एक मौसिक़ी है ,,एक रिधम है ,,उर्दू एक मोहब्बत है ,,एक प्यार है ,,यह हमारी मादरी सबसे पहले माँ की गोद में बोली जाने वाली ,,अम्मी ,,माँ कहने वाली जुबां है ,,उर्दू इंक़लाब भी है ,,उर्दू ज़िंदाबाद भी है ,,उर्दू हिंदुस्तान है ,,,उर्दू भारत है ,,उर्दू तहज़ीब है ,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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