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19 अप्रैल 2016

पत्रकारिता के गीत

🌿पत्रकारिता के गीत🌿🍁
रोज लिखता हूँ रोज ही बवाल होता है।
अक्सर मेरी कलम पर सवाल होता है।।
तमाम जुल्मो की इबारत खींचता हूँ मैं।
रोज ही जुल्मों से मेरा इंकलाब होता है।।
लकीरें खींच देता हूँ महंगाई पर अक्सर।
जमाखोरो का अक्सर बुरा हाल होता है।।
ये कलम खाकी और खादी पे चलती है।
अक्सर इसपर भी छिपकर वार होता है।।
मेरी सहाफत को सहादत भी मिलती है।
तिरंगा ओढने को दिल बेकरार होता है।।

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