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22 सितंबर 2015

हिंदी ब्लॉगिंग की मेरी पोस्ट हुई पन्द्राह हज़ार ,,में हूँ खुदा का शुक्रगुज़ार ,,,

हिंदी ब्लॉगिंग की मेरी पोस्ट हुई पन्द्राह हज़ार ,,में हूँ खुदा का शुक्रगुज़ार ,,,,,,,,,,,,,,,,,,आप सभी रहे मुझ से ,,मेरी लेखनी से बेज़ार ,,इसीलिए दोस्तों में आपका भी हूँ शुक्रगुज़ार ,,,,,,,,,,,,,,,,,मेरी ख्वाहिश पूरी हुई अब मोत भी आ जाए तो गम नहीं ,,,,,,,,,,,,,,आपका प्यार ही मेरे लिए है सबसे बढ़ा पुरस्कार ,,मेरी दुआएं है आप साथियो के लिए बेशुमार ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,मेरी इन पोस्टों में गीता भी है ,,क़ुरआन भी है ,,,गुरुवाणी भी है तो बाइबिल भी है ,, सभी धर्मो का समागम भी है ,,प्यार भी है तकरार भी है ,,चिंतन भी है ,,हंसी मज़ाक भी है ,,शायरी भी है तो लफ़्फ़ाज़ी भी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
दोस्तों आज तेईस सितम्बर है ,,यह दिन किसी का जन्म दिन तो किसी के लिए अपने अपने हिसाब से महत्ता रखता है ,,लेकिन आज तेईस सितबर को खुदा ने मुझे जो तोहफा ,,मुझे जो हिम्मत ,,मुझे जो मेरे मक़सद में कामयाबी दी है इसके लिए में शुक्रगुज़ार हूँ ,,आज मेरा टारगेट मेरे हिंदी ब्लॉग लेखन की पन्द्राह हज़ार पोस्ट पूरी करने का था ,,और खुदा ने मेरा यह टारगेट पूरा किया ,,दोस्तों में खुदा का इसलिए भी शुक्रगुज़ार हूँ के ,,एक कड़वा सच ,,कुल्लू नफ़सून ज़ायकतुल मोत ,,मोत का मज़ा हर शख्स को चखना है ,,सभी जानते है ,,मोत सभी को आना है ,,मुझे भी आना है ,,लेकिन खुदा से मेरी ख्वाहिश थी मेरी पन्द्राह हज़ार हिंदी ब्लॉग की पोस्ट पूरी होने तक ,,खुदा मुझे सलामत रखना ,,मुझे ज़िंदा रखना ,,और मेरे खुदा ने मेरी दुआ क़ुबूल की तेईस सितमबर दो हज़ार पन्द्राह का दिन ,,तेईस सितमबर मेरे लिए खुदा ने यादगार बना दी ,,आज मेरी पन्द्राह हज़ार हिंदी ब्लॉग की पोस्ट पूरी हुई ,,में खुश हु ,,खुदा का शुक्रगुज़ार भी हूँ ,,,,सभी जानते है के किसी के मरने जीने से कोई फ़र्क़ नहीं पढ़ता ,,पीछे जो लोग छूट जाते है उनका खुदा निगेहबानी करता है ,,लेकिन मेरा टारगेट ,,मेरा लेखन ,,सिर्फ और सिर्फ मेरी ज़िंदगी से जुड़ा हुआ था जिसे में ही मुकम्मल कर सकता था और खुदा ने इस टारगेट को पूरा होने तक मुझे खुशहाल ज़िंदगी दी ,,इसके लिए में खुदा का शुक्रगुज़ार हूँ ,,,,,,दोस्तों सभी के ज़हन में एक सवाल होगा के आखिर क्या है इस तेईस दिसम्बर में जो आज के दिन ही ,,हिंदी ब्लॉगिंग की पन्द्राह हज़ार पोस्टें पूरी करने की मेरी ज़िद ,,मेरी ख्वाहिश थी ,,दोस्तों किसी के लिए इस दिन की कोई भी महत्ता हो लेकिन आज खुदा के इन्साफ का दिन है ,,,आज खुदा ने रात दिन बराबर के किये है ,,,बारह बारह घंटे के रात दिन ,,दो सो छियासठ दिन ,,अगर लीप इयर हो तो दो सो सड़सठ दिन ,,बस खुदा का दिनों के घंटो में भी बराबरी का इन्साफ का में क़ायल हुआ और आज के ही दिन को मेने मेरी हिंदी ब्लॉगिंग की पन्द्राह हज़ार पोस्ट पूरी करने का टारगेट बनाया ,,,,,,,,,,,,,,सितम्बर का महीना हिंदी दिवस भी है चवदाह सितम्बर हिंदी दिवस पर भी में यह पोस्ट पूरी करना चाहता था लेकिन फिर तेईस सितमबर इन्साफ का दिन ,,बराबरी का दिन ही मुझे पसंद आया और मेरी खुदा से इल्तिजा थी ,,ऐ खुदा तो मेरे हालात सही रख ,,अगर मेरी मोत वक़्त से पहले निश्चित है तो कमसे कम मुझे तेईस सितमबर तक ,,मेरी पोस्ट पूरी करने तक तो मुझे मोहलत दे दे ,,मेरे खुदा ने मेरी सुनवाई की और मुझे इस दिन तक ज़िंदगी बख्श दी ,,,में फिर खुदा का शुक्रगुज़ार हूँ ,,दोस्तों दस साल की उम्र में मेरा पहला छोटा सा एक लेख ,,बच्चो की किताब लोटपोट में छपा ,फिर चंदा मामा ,,धर्मयुग ,,,में मेरे लेख छपने लगे ,मुझे लेखन में होसला मिला ,,में बहुत कुछ नहीं लिख सका लेकिन आपातकाल के पूर्व ही में हिंदी पत्रकारिता के शैशव काल में था ,,में लिखने का हुनर सीख रहा था ,,,,रोज़ नियमित रूप से ,,अख़बार की सभी खबरों को साइकिल से कलेक्ट्रेट लेजाता ,,कलेक्टर से जांच करवाता उनकी मोहर लगवाकर कुछ सेंसर न्यूज़ हटाने के बाद ,,अख़बार छापने के लिए सरकार से स्वीकृत खबरों को छपवाता ,,,मेने आपात काल का दौर देखा ,,आपात काल के बाद आज़ादी की तरह जश्न देखा ,तो मोरारजी देसाई के वक़्त शराब बंदी ,,महंगाई जो आसमान पर थी उसे ज़मीन से भी अंदर धरातल के अंदर न्यूनतम होते देखा ,,कालाबाजारियों को जेल जाते देखा ,,,,दंगो के दौरान कर्फ्यू के हालात देखे ,,मारकाट नफरत के हालात में कर्फ्यू पास लेकर रिपोर्टिंग का अनुभव देखा ,,पत्रकारिता में पी जी कोर्स करते वक़्त युद्ध रिपोर्टिंग का व्यवहारिक अनुभव देखा ,,,,,कई बढ़ी हस्तिया राजीव गांधी ,,,अटल बिहारी वाजपेयी ,,मुरली मनोहर जोशी ,प्रवीण तोगड़िया ,,,लालकृष्ण अडवाणी ,,उमा भारती ,,नरसिंम्हा राव ,,ऐ पी जे अब्दुल कलाम ,,हामिद अंसारी ,,भेरो सिंह शेखावत सहित कई फ़िल्मी हीरो ,,हिरोईन सहित सेलेब्रिटीज़ का इंटरव्यू करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ ,,,,,एक वक़्त था जब अख़बार से मंत्री ,,,नेता ,,अफसर सभी घबराते थे ,,अख़बार की कतरनों पर रोज़ समीक्षा कर दोषी अफसरों को सज़ा मिलती थी ,,चुनाव में पेड़ खबरे नहीं होती थी ,,पेड़ पूर्व सर्वेक्षण नहीं होता था ,,,,,नफरत की लेखनी नहीं होती थी सिर्फ खबरे और हालात की समीक्षा होती थी ,,अख़बार से जुड़े लोगों को सम्मान मिलता था ,,अख़बार वालो में दारु पार्टियो ,,गिफ्ट लेने की संस्कृति नहीं थी ,,जो लिखा जाता था प्रमाणित होता था ,,निष्पक्ष और निर्भीक होता था ,,लेकिन वक़्त बदला ,,चैनल आये ,,पत्रकारिता ,,पत्रकारिता से प्रेस फिर मिडिया बन गई ,,सच दम घुटने लगा ,,इसी बीच मेरे आदरणीय पिता इंजिनियर असगर अली खान जिन्हे में और पूरा परिवार साहिब जी कहते है का हुक्म हुआ पत्रकारिता छोडो वकालत करो ,,मेरे लिए संकट का वक़्त था एक तरफ मेरा शोक पत्रकारिता और लेखन का दूसरी तरफ पिता का हुक्म ,,खेर पिता का आदेश सर्वोपरि था ,,मुझे पत्रकारिता छोड़ना पढ़ी ,,वकालत की शुरआत हुई ,,लेकिन मन पत्रकारिता और लेखन के साथ था ,,,,मेरे पुत्र इंजीनियर शाहरुख खान ने मुझे इंटरनेट पर ब्लॉगिंग की विधा बताई ,,गूगल हिंदी ट्रान्सलिट्रेयेशन में लिखने की कला सिखाई ,,बस फिर क्या था मेने हिंदी ब्लॉगिंग शुरू की ,,मेरी मदद मेरे बढ़े भाई दिनेश द्विवेदी जो हिंदी ब्लॉगिंग के नामचीन नाम है उन्होंने मार्गदर्शन देकर की ,,तो उन्होंने ने मेरे ब्लॉग को संवारा ,,मेरे बढ़े भाई घुमन्तु ब्लॉगर भाई ललित शर्मा ने मुझे तराशा ,,नई विधा के बारे में बताया ,,तो छोटे भाई रमेश चंद जेन पत्रकार दिल्ली वालो ने भी मेरे ब्लॉग को सहारा दिया ,,,भाई मासूम ब्लॉगर ,,डॉक्टर अनवर जमाल ,,भाई पाबला जी ,,शाहनवाज़ हुसेन दिल्ली ,,सहित सभी मेरे भाइयो का में शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने मुझे हिम्मत दी ,,,में एक सच कड़वा सच ,,आप लोगों से इस अवसर पर शेयर करना चाहता हूँ ,,दोस्तों में जब लेखन क्षेत्र में आया ,,पत्रकारिता क्षेत्र में आया ,मेरी लेखनी आग हुआ करती थी ,,अलफ़ाज़ शोले भड़काते थे ऐसा लोग कहते थे ,,अल्फ़ाज़ों में थोड़ा बद्तमीज़ाना अंदाज़ भी होता था ,,मेरी अम्मी जान ने एक बार मेरी एक खबर पर जो की उनसे शिकायत करने पहुंचे तो मुझे कड़वे अल्फ़ाज़ों के बारे में समझाया ,,,कहा के हम इस्लाम के जानकार है ,,अपनी बात हम निडरता ,,निष्पक्षता से कहते लेकिन शहद में घोलकर ,,मीठे अल्फाज़ो में बेहूदा अलफ़ाज़ हमारे लिए नहीं है ,,बस मेने खुद को बदल डाला ,,अपनी बात तहज़ीब के दायरे में लिखने की कोशिश की ,,मेरी लेखनी पर कई हमले हुए लेकिन मेने हर बार जवाब शालीनता से दिया या खामोश हो गया ,,,,,मेरी लेखनी से लोगों को जोड़ने ,,लोगों में प्यार बाँटने ,,लोगों को लोगों से मिलाने की मेने कोशिश की ,,,,,मेरी निष्पक्षता निर्भिकता पर मुझे नाज़ था लेकिन दोस्तों में अब में खून के आंसू रोता हूँ ,,में लेखक तो हूँ लेकिन बेबस ,,लाचार ,,दायरों में सिमटा हुआ हूँ ,,पिछले दिनों में उर्दू आंदोलन से जुड़ा प्रमुख बागडोर कोटा शहर क़ाज़ी के बाद मेरे हाथो में थी ,,मेरे छोटे भाइयो ने कहा के आप ,,सिर्फ उर्दू के लिए लिखो ,,दस दिन आंदोलन होने तक दूसरे किसी भी विषय पर मत लिखो ,,सच में बहुत रोया लेकिन मुझे लड़ाई जीतना थी इसलिए मेने मेरे भाइयो के आदेश की पालना की ,,मेने दुसरा कुछ नहीं लिखा ,,,,,,मेरी उंगलिया थरकती ,,विचार भड़कते लेकिन खामोश सिर्फ खामोश ,,,पिछले दिनों मुझे प्रदेश कांग्रेस कमेटी में मेरे भाई रशीद क़ादरी ,,कैलाश बंजारा ,,मक़सूद भाई और दूसरे साथियो ने दबाव बनाकर मुझे कोटा संभाग अल्पसंख्यक विभाग का चेयरमेन बनवा दिया ,,मेरी ज़िम्मेदारियाँ तो बढ़ी लेकिन क़लम पर ब्रेक लग गया ,,दोस्तों खुदा का शुक्र है के प्रदेश अल्पसंख्यक विभाग के चेयरमेन हाजी निज़ाम कुरैशी स्वतंत्र निष्पक्ष विचारो के क़द्र दान है इसलिए मुझे लेखन में बहुत ज़्यादा दिक़्क़त नहीं है ,,लेकिन में समझता हूँ में आज़ाद नहीं हूँ में पहले वाला अख्तर नहीं हूँ जो समाज के लिए ,,जो देश के लिए ,,जो शोषित पीड़ितों के लिए ,,जो हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय देता था वोह आज कुछ कांग्रेस से जुड़े मुद्दो पर ,,गलतियों पर खामोश रहता है और बस इसी लिए कई बार घुटन होती है ,,,लेखनी पर तरस आता है ,,,सोचता हूँ शुरआती दौर में आग उगलने वाला यह अकेला शख्स कितना बदल गया है ,,कई मुद्दो को चबा जाता है ,,कई अपराधो को ,,,कई ज़ुल्म की कहानियो को खा जाता है ,,,कई गलत बातो को होता देख खामोशी इख़्तियार करता है ,,,,,,,,कई गलतियों को नज़र अंदाज़ करता है ,,लेकिन दोस्तों में फिर भी कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र ढाँचे में अपनी बात लिखकर ज़रूर भेजता हूँ ,,लेकिन में आज अपनी लेखनी से संतुष्ठ नहीं हु ,,संतुष्ठ नहीं हूँ ,,मुझे लगातार झेलने ,,मेरी पोस्ट देखने के लिए आपका शुक्रिया ,,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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