हमें चाहने वाले मित्र

10 अगस्त 2015

कभी मैं भी

कभी मैं भी आइना देखता था !!
__
कभी किसी की रोटीयाँ मैंने भी जलायीं हैं . . .
इसी गुमां पे,
अब भी आइना देख लेता हूँ . . !
____
जल गई थी,
तबे पर,,
कभी रोटी उनकी--
मुझे सोचकर !!

हाय !
ख्याल जब भी,
उस ख़त का आता है,
मैं अब भी,
आईना देख लेता हूँ !!
__
अक्सर कलछुल से,
आँच पर चढ़ी सब्जी का सूप लेकर,
उसमें झटके से उँगली डुबोकर,
उँगली जीभ पर रखकर,
नमक चखा करती थी,
कि मुझे सोचते-सोचते,
कहीं . . ,,
नमक डालना भूल तो नहीं गई?
हाय !
ख्याल जब भी,
उस ख़त का आता है,
मैं अब भी,
आइना देख लेता हूँ !!
__
एक ख़त,
जिसमें लिखा है . .
"आज चाय में शक्कर की जगह नमक डाल दी"--
तब सोच रही थी,
कि आज रात में, ख़त में ;
तुम्हें क्या-क्या लिखूँगी ??
माँ सिर पीट रही है . .
तन्दुरुस्त बच्ची को आजकल क्या हो गया है ??
हाय !
ख्याल जब भी,
उस ख़त का आता है,
मैं अब भी,
आइना देख लेता हूँ !!
_
प्रवीण कुमार ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

दोस्तों, कुछ गिले-शिकवे और कुछ सुझाव भी देते जाओ. जनाब! मेरा यह ब्लॉग आप सभी भाईयों का अपना ब्लॉग है. इसमें आपका स्वागत है. इसकी गलतियों (दोषों व कमियों) को सुधारने के लिए मेहरबानी करके मुझे सुझाव दें. मैं आपका आभारी रहूँगा. अख्तर खान "अकेला" कोटा(राजस्थान)

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...