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21 अगस्त 2015

लिखने बैठा तो

लिखने बैठा तो सोच में पड़ गया
किस हसीना की अदाओं पे लिखूं
मगर दिख गयी एक तस्वीर यारो
सोचा वतन के हालात पे लिखूं
किसी भूखे विलखते बच्चे पे लिखूं
या मरते जवान और किसान पे लिखूं
दहेज़ के लिए जलती बेटी पे लिखूं
या नशे के मारे युवा पे लिखूं
बेपरवाह औलाद पे लिखूं
या बलात्कारी जलाद पे लिखूं
लिख दूं किसी रिश्वतखोर पे
या ज़ालिम सरकार पे लिखूं
कसूरवार किसे मानू
नेता अभिनेता या अभिमान लिखूं
सोचता हूँ जब हिस्सा हूँ इस खेल का
तो क्यों ना
कसूरवारों में पहला खुद का नाम लिखूं.

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