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23 जुलाई 2015

क़त्ल और आतंकवाद को इस्लाम का समर्थन नहीं


वो लोग जो अपने क़त्लो-ग़ारत और दहशतगर्दी के कामों को इस्लाम के आदेशानुसार बतलातें हैं वो कुरान और रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तालीमों का अपमान करतें है ।
क्योंकि कुरान वो ग्रंथ है जिसने एक क़त्ल के अपराध को पूरी इंसानियत के कत्ल करने के अपराध के बराबर रखा और कहा,
» अल-कुरान: “जिसने कोई जान क़त्ल की, बग़ैर जान के बदले या ज़मीन में फसाद किया तो गौया उसने सब लोगों का क़त्ल किया और जिसने एक जान को बचा लिया तो गौया उसने सब लोगों को बचा लिया (सूर: 5, आयत 32)
» अल-कुरान: “किसी जान को क़त्ल न करो जिसके क़त्ल को अल्लाह ने हराम किया है सिवाय हक़ के ।”- (सूरह इसरा, आयत 33)
कुरान जिस जगह नाज़िल हुआ था पहले वहां के इंसानों की नज़र में इंसानी जान की कोई कीमत न थी । बात-बात पे वो एक दूसरे का ख़ून बहा देते थे, लूटमार करते थे । कुरान के अवतरण ने न केवल इन क़त्लों को नाजायज़ बताया बल्कि क़ातिलों के लिये सज़ा का प्रावधान भी तय किया ।
वो आतंकी लोग जो कुरान के मानने वाले होने की बात करते हैं उन्हें ये ज़रुर पता होना चाहिये कि इस्लाम ने ये सख़्त ताकीद की है कि ख़ुदा की बनाई इस धरती पर कोई फसाद न फैलाये
» अल-कुरान: “हमने हुक्म दिया कि खुदा की अता की हुई रोज़ी खाओ और धरती पर फसाद फैलाते न फिरो”- (सूरह बकरह, आयत- 60)
कुरान वो ग्रंथ है जो न केवल फसाद (आतंकवाद) यानि दहशतगर्दी फैलाने से मना करता है बल्कि दशहतगर्दी फैलाने वालों को सजा-ए-क़त्ल को जाएज़ करार देता है (सूरह माइदह, आयत- 32)
यहां ये बात भी याद रखने की है कि पवित्र कुरान में जिहाद शब्द केवल 41 बार आया है (वो भी विभिन्न अर्थों में) जबकि रहमत या दया शब्द 335 बार और इंसाफ शब्द 244 बार आया है ।

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