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30 जुलाई 2015

टाइगर ने याकूब से कहा था- गांधीवादी बन जा रहे हो, आतंकवादी करार दिए जाओगे

इमेज कर्ट्सी : डीएनए।
इमेज कर्ट्सी : डीएनए।
नई दिल्ली. मुंबई में 1993 में हुए सीरियल बम ब्लास्ट का गुनहगार याकूब मेमन भारत कैसे लौटा था, इसे लेकर कई तरह की थ्योरी सामने आती रही हैं। आईबी में अफसर रहे बी. रमण की मानें तो याकूब को सरेंडर करने के लिए राजी किया गया था। वहीं, सीबीआई ने याकूब की गिरफ्तारी पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से दिखाई थी। एक और थ्योरी कहती है कि इंटरपोल ने उसे भारतीय एजेंसियों को सौंपा था और फिर उसे सरकारी प्लेन से नई दिल्ली लाया गया। आखिर याकूब भारत क्यों लौटा था, जब उसने लौटने का मन बनाया तो उसके भाई और दाऊद इब्राहिम के करीबी टाइगर मेमन ने उससे क्या कहा था? याकूब के ब्रीफकेस में क्या था और उसके गिरफ्त में आने के पीछे क्या थी थ्योरी? जानिए...
जब याकूब ने लौटने का मन बनाया तो टाइगर ने उससे क्या कहा था?
याकूब ने 1994 में एक वेबसाइट और एक चैनल को इंटरव्यू दिया था। इसमें उसने बताया था कि उसका भाई और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का गुर्गा इब्राहिम उर्फ टाइगर मेमन उसके भारत लौटने के खिलाफ था। टाइगर ने याकूब से कहा था- ‘तुम गांधीवादी बनकर जा रहे हो, लेकिन वहां आतंकवादी करार दिए जाओगे।’ इंटरव्यू में याकूब ने बताया था कि जब उसका परिवार कराची गया तो वहां एयरपोर्ट पर एक पाकिस्तानी एजेंट आसिफ ने उसे रिसीव किया। एजेंट ने याकूब का इंडियन पासपार्ट ले लिया और उसे पाकिस्तानी पासपोर्ट दे दिया। कराची में उसे तौफीक जलियांवाला के घर रुकने को कहा गया। याकूब को तौफीक से पता चला कि टाइगर और उसके गुर्गों को पाकिस्तान के अंदर आईएसआई ने ही मुंबई में बम रखने की ट्रेनिंग दी थी।
पहली थ्योरी : क्या अपनी प्रॉपर्टी के लिए लौटा था याकूब?
1991 में याकूब ने अपने बचपन के फ्रैंड चेतन मेहता के साथ मेहता एंड मेमन एसोसिएट्स नाम से अकाउंटिंग फर्म शुरू की थी। बाद में इस फर्म का तीसरा पार्टनर गुलाम भोरिया बना। वह अकाउंटेंसी की पढ़ाई करते वक्त दोस्त बना था। लेकिन यह फर्म सिर्फ एक साल ही चल सकी। यह 1992 में बंद कर दी गई। हालांकि फर्म बंद होने के कारणों का कभी खुलासा नहीं हो पाया। इसके बाद याकूब ने एआर एंड सन्स के नाम से दूसरी फर्म बनाई। वह यहीं नहीं रुका। उसने एक्सपोर्ट सेक्टर में भी हाथ अजमाया। उसने तिजारत इंटरनेशनल के नाम से एक्सपोर्ट फर्म भी बनाई थी। यह फर्म मिडिल ईस्ट में मीट (मांस) को एक्सपोर्ट करती थी। इस फर्म की सक्सेस की वजह से याकूब की फाइनेंशियल पाेजिशन मजबूत हो गई। इसके बाद ही याकूब ने मुंबई के माहिम इलाके की अल-हुसैनी बिल्डिंग में 6 फ्लैट खरीदे थे। इसी बिल्डिंग में उसके भाई टाइगर मेमन के दो डुप्लेक्स थे। बताया जाता है कि याकूब अपनी मजबूत फाइनेंशियल पोजिशन खोना नहीं चाहता था। इसी प्राॅपर्टी के लिए वह कराची से लौटा था।
दूसरी थ्योरी : याकूब वकील से मिलने काठमांडू आया था, ब्रीफकेस में थी भाई से बातचीत की सीक्रेट रिकॉर्डिंग वाली कैसेट
- 2007 की इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक, याकूब ने मुंबई में रहने वाले एक वकील को मुलाकात के लिए काठमांडू बुलाया था। याकूब कराची से वहां पहुंचा था। यह वकील सीरियल ब्लास्ट मामले से याकूब का नाम हटाने की कोशिश कर रहा था। याकूब अपने साथ कई सारे डॉक्युमेंट्स, वीडियो और ऑडियो कैसेट्स एक ब्रीफकेस में लेकर आया था। ब्रीफकेस में कई सारी चाबियों का गुच्छा भी था। जब वह वकील से मुलाकात कर कराची लौट रहा था तो एयरपोर्ट पर सिक्युरिटी चेक के दौरान एक्सरे मशीन ने चाबियाें के चलते अलार्म बजा दिया। जब ब्रीफकेस खोला गया तो उसमें याकूब और उसके परिवार के इंडियन पासपोर्ट मिले। दस्तावेजों और वीडियो-ऑडियो कैसेट्स से नेपाल पुलिस को शक हुआ। इसमें टाइगर मेमन के साथ याकूब की बातचीत के बारे में सीक्रेट रिकॉर्डिंग भी थी। बताया जाता है कि इसमें याकूब ने टाइगर से दाऊद के बारे में बात की थी। उसने दुबई से लौटे टाइगर से पूछा था कि दाऊद इन दिनों कहां है? पूछताछ के बाद सीबीआई को वहां बुलाया गया और इस तरह याकूब सीबीआई की गिरफ्त में आया।
- याकूब को यूपी बॉर्डर पर सोनौली में 28 जुलाई, 1994 को तड़के 3 बजे सीबीआई के हवाले किया गया था। उसे आंख पर पट्टी बांधकर गोरखपुर ले जाया गया। वहां से उसे स्पेशल प्लेन से नई दिल्ली लाया गया। उस ब्रीफकेस का बाद में क्या हुआ, यह साफ नहीं हाे सका। याकूब ने मजिस्ट्रेट को दिए बयान में भी यही कहा था कि काठमांडू में इंटरपोल ने उसे पकड़ा था। वह 21 जुलाई, 1994 को कराची से काठमांडू आया था। उसने 24 जुलाई को वापसी का टिकट लिया था। 2007 में ही याकूब की पत्नी रहीन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वे लोग इसलिए भारत लौटे थे, क्याेंकि कराची में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें नजरबंद कर रखा हुआ था।
तीसरी थ्योरी : रॉ ने याकूब काे सरेंडर के लिए राजी किया
इंडियन इंटेलिजेंस एजेंसी रॉ के पाकिस्तान डेस्क के हेड रहे बी. रमण ने 2007 में एक वेबसाइट को अपना आर्टिकल भेजा था। इसमें उन्होंने लिखा था, ‘जुलाई 1994 में मेरे रिटायरमेंट से कुछ हफ्ते पहले याकूब को काठमांडू से लाया गया था। उसे हम सड़क के रास्ते नेपाल से भारत के एक शहर में लाए थे। इसके बाद एविएशन रिसर्च सेंटर के प्लेन में दिल्ली लाए। गिरफ्तारी पुरानी दिल्ली से बताई। इसके बाद उससे पूछताछ शुरू हुई। उसे और उसके परिवार को पाकिस्तान से आकर सरेंडर करने के लिए राजी किया गया था। उसकी डेथ पेनल्टी पर विचार करते वक्त इस बारे में सोचा जाना चाहिए।’ रमण ने 2007 में वेबसाइट को यह आर्टिकल रिलीज करने से रोक दिया था। हाल ही में यह लेख सामने आया।
चौथी थ्योरी : याकूब से डील नहीं हुई, उसके परिवार को पाकिस्तान में घुटन होती थी
मुंबई बम ब्लास्ट केस की इन्वेस्टिगेटिव टीम के चीफ रहे सीबीआई के पूर्व अधिकारी शांतनु सेन कहते हैं कि याकूब को लाने के लिए कोई सीक्रेट डील नहीं हुई थी, बल्कि सीबीआई ने पाकिस्तान में अपने सभी संपर्कों का इस्तेमाल किया था। एक चैनल से बातचीत में सेन ने बताया, "पाकिस्तान में रह रहे याकूब मेमन के परिवार को भारत में उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाया गया था। हमें सूत्रों से पता चला था कि मेमन के परिवार में ही याकूब की वापसी को लेकर मतभेद थे। टाइगर मेमन नहीं चाहता था कि याकूब भारत लौटे। लेकिन याकूब और उसके परिवार को पाकिस्तान में घुटन हो रही थी। उन्हें लगता था कि शायद पाकिस्तानी कभी उन पर भरोसा नहीं करेंगे और वे इस मुल्क में नहीं रह पाएंगे। इसलिए वे भारत लौटना चाहते थे।"

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