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27 जून 2015

ज़िंदगी दर्द

ज़िंदगी दर्द में डुबोने से
चैन मिलता है मुझको रोने से
उनको कुछ फर्क ही नहीं पड़ता
मेरे होने से या न होने से
कुछ भी होगा न अब तुम्हे हासिल
ख़वाब बंजर ज़मीं में बोने से
तेरी किस्मत बदल न पाएगी
रात दिन सिर्फ़ रोने धोने से
देखो मिलती है कब निजात सिया
लाश काँधे पे अपनी ढोने से

1 टिप्पणी:

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