इंसान का अच्छा स्वभाव, व्यवहार और कर्म ही अंतत: सफल और सुखी जीवन का कारण होते हैं। किंतु यह भी सत्य है कि हर व्यक्ति के विचार और स्वभाव में गुण-दोष होते हैं, जो व्यवहार और कर्म को नियत करते हैं। जहां गुण मान-प्रतिष्ठा और यश देते हैं, वहीं दोष से अपयश ही नहीं मिलता, बल्कि कुछ दोष तो गुणों को भी दफन कर देते हैं।
ईर्ष्या, डाह या जलन भी इंसान का ऐसा ही वैचारिक दोष है। ईष्र्या इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। जिससे इंसान अपनी ही बुरी सोच की आग में अंदर ही अंदर खुद ही जलकर बर्बाद हो सकता है। यह बुरी लत की तरह अंतत: बुरे नतीजों से पहचान, प्रतिष्ठा को नुकसान ही नहीं पहुंचाती, बल्कि अविश्वास का कारण बनती है।
यही कारण है कि हिन्दू धर्म ग्रंथ महाभारत में ईर्ष्या, दाह या जलन को बुराई बताकर इससे यथासंभव दूर रहने की सीख दी गई है। चूंकि आज के दौर का सुख-सुविधाओं की चकाचौंध भरा जीवन हर किसी के मन को डांवाडोल कर सत्य, दया, परोपकार जैसी धर्म की राह से भटका देता है। इस नजरिए से यहां बताई जा रही बात न केवल आज के दौर के लिए सार्थक है, बल्कि सावधान करने की चेतावनी भी है। जानते हैं कि इंसान को किन-किन विषयों को लेकर ईर्ष्या का भाव मन में नहीं लाना चाहिए -
लिखा गया है कि -
य ईर्षु: परवित्तेषु रूपे वीर्ये कुलान्वये।
सुखसौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तक:।।
सरल शब्दों में अर्थ है कि किसी के सुख, सौभाग्य, पराक्रम, धन, रूप, कुलीनता और मान-सम्मान को देखकर ईर्ष्या करने का दोष लाइलाज बीमारी है।
इसमें सुखी जीवन का सूत्र यही है कि दूसरों के सुखों को देखकर अपने प्राप्त सुखों को खोते रहना भी अभाव और दरिद्रता को खुला निमंत्रण है। इसलिए ईर्ष्या के बजाय अपने कर्म, काबिलियत और विचार शक्ति पर भरोसा रख सुखों को बंटोरते रहें।

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