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18 अक्तूबर 2011

आदेश का पालन क्यों नहीं किया, क्या सरकार अराजकता चाहती है'



जयपुर.पदोन्नति में सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को उनकी पुन:अर्जित वरिष्ठता का लाभ देने के आदेश का पालन नहीं करने पर हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा कि सरकार क्या अराजकता चाहती है।

यह कैसी लोक कल्याणकारी सरकार है जो 15 सालों से आरएएस/आरपीएस व अन्य सेवाओं में जिन्हें पदोन्नति मिलनी चाहिए उनका अधिकार छीन रही है। लोकसभा व विधानसभा को भी कोर्ट के निर्णय के खिलाफ जाने का औचित्य नहीं है तो सरकार के कुछ अफसर कैसे निर्णय ले सकते हैं जो प्रथम दृष्टया ही अवमानना हो।

मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा व न्यायाधीश एन.के.जैन (प्रथम) ने यह टिप्पणी मंगलवार को टिप्पणी मंगलवार को बजरंग लाल शर्मा व समता आंदोलन समिति की अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान की। खंडपीठ ने कहा कि रुल्स में तदर्थ का प्रावधान अवैध है और सरकार को डेमोक्रेटिक सिस्टम का सम्मान करना चाहिए, अदालत इसका अपमान बर्दाश्त नहीं करेगी।

सरकार 3 नवंबर तक आदेश की पालना करें नहीं तो हाईकोर्ट बताएगी कि उनके पास क्या शक्तियां हैं।

सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता जी.एस.बापना ने खंडपीठ से सुनवाई टालने का आग्रह किया और कहा कि वे दो महीने में डीपीसी कर देंगे तो खंडपीठ ने नाराज होकर कहा कि उन्हें व सरकार को कानून मालुम होना चाहिए और जो कानून स्थापित है उसे समझना चाहिए।

अवमानना के मामले में इतना सुनने का प्रावधान नहीं है फिर भी हम आपको सुन रहे हैं। जब कानून की समझ ही नहीं है तो फिर ये लंबी चौड़ी मशीनरी किस लिए रख रखी है। अदालती आदेश का पालन नहीं करना दुर्भाग्यपूर्ण है, आप पालना क्यों नहीं कर रहे हो जबकि हम 7 से 8 बार समय दे चुके हैं।

जब हाईकोर्ट ने मामले में निर्णय दे दिया, सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दे दिया फिर क्यों मामले को लटका रखा है। खंडपीठ ने कहा कि सरकार दुनिया का कोई भी वकील ले आए मामले में सरकार के पक्ष में कहने के लिए कुछ भी नहीं है।

सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव प्रकाश शर्मा ने कहा कि एक तरफ तो सरकार मामले की सुनवाई स्थगित करवा रही है और दूसरी ओर तहसीलदार आदि पदों पर गैर कानूनी तरीके से पदोन्नति दे रही है।

इस पर खंडपीठ ने महाधिवक्ता को आदेश की पालना के लिए 3 नवंबर तक का समय देते हुए उनसे 11 सितंबर 2011 की अधिसूचना का भूतलक्षी प्रभाव से लागू करने पर पुन: विचार करने के लिए कहा। इस पर महाधिवक्ता ने भी पुन: विचार के लिए कहा।

कैसे निरस्त किया रुल्स से ऑर्डर:

खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि महाधिवक्ता कहते हैं कि रीगेनिंग कोई मूल अधिकार नहीं है लेकिन यहां पर रीगेन का लाभ देकर कई पदोन्नत हो गए हैं। सरकार ने रुल्स से अदालती आदेश को निरस्त कर दिया है, लेकिन महाधिवक्ता बताएं कि निर्णय निरस्त करने की शक्ति संविधान में कहां से आई। क्या ऐसा कोई प्रावधान है तो बताएं, आदेश की पालना के लिए क्या किया।

और क्या कहा कोर्ट ने

>यह कैसी लोक कल्याणकारी सरकार है जो 15 सालों से पदोन्नति के अधिकार छीन कर बैठी है।

>जब लोकसभा और विधानसभा भी कोर्ट के खिलाफ नहीं जा सकती, तब सरकार के कुछ अफसर ऐसी हिमाकत कैसे कर सकते हैं ?

>महाधिवक्ता और सरकार को कानून मालूम होना चाहिए। जब कानून की समझ ही नहीं है तो लंबी-चौड़ी मशीनरी किसलिए रख रखी है।

>सुप्रीम कोर्ट निर्णय दे चुका, हाईकोर्ट भी दे चुका, सात-आठ बार मोहलत दे चुके फिर आदेश का पालन क्यों नहीं हो रहा ?

>सरकार दुनिया का कोई भी वकील ले आए, इस मामले में उसके पक्ष में कहने के लिए कुछ भी नहीं है।

>सरकार ने रूल्स से अदालती आदेश निरस्त कर दिया है। महाधिवक्ता बताएं कि निर्णय निरस्त करने की शक्ति उनके पास कहां से आई ?

>सरकार तीन नवंबर तक आदेश का पालन करे, वर्ना हाईकोर्ट बताएगा कि उसके पास क्या शक्तियां हैं।

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