आपका-अख्तर खान

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25 मार्च 2011

में पतझड़ हूँ तू हरियाली हे

में पतझड़ हूँ 
इसीलियें तो 
तेरी सख्त शाखों से 
यूँ टूट टूट कर 
बिखर रहा हूँ 
तुझ से 
यूँ अलग होकर 
रोज़ नीचे 
जमीन पर 
गिर रहा हूँ 
बस 
तू ही हे 
जो हरियाली हे 
इसीलियें तो 
मासूम कोपलों की तरह 
खुबसूरत हरे भरे 
पत्तों की तरह 
यूँ इन कठोर 
टहनियों के 
सीने से लगे बेठे हो ..................................
अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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