वो झुंड में चुगते कबूतर,
वो झुंड में उड़ते कबूतर,
वो ठंडी हवा,
नदी की लहरों का धीमा-सा शोर,
दाने पर अचानक टूट पड़ती
मछलियों की वो बेचैन-सी भीड़…
वो पुल,
वो बाँध,
वो बंद होते-बुलाते दरवाज़े,
वो मटमैली-सी,
धूल में सनी सीढ़ियाँ—
हाँ, सब याद है मुझे।
मगर तुम्हें…
तुम्हें तो शायद इनमें से कुछ भी याद नहीं।
तुम्हें तो अभी बहुत कुछ देखना है,
बहुत दूर जाना है,
बहुत-सी खूबसूरत मंज़िलों को
अपनी आँखों में भरना है।
तो फिर…
तुम क्यों याद रखो
इन छोटी-छोटी बातों को?
तुम्हारा यह विराम नहीं,
यह आराम नहीं—
बस सफ़र थोड़ा लंबा है,
रास्ता थोड़ा मुश्किल है।
इसलिए फिक्र रहेगी तुम्हारी…
ज़रा सँभलकर,
ज़रा एहतियात से चलना।
और हाँ—
क्यों याद रखो तुम
वो मटमैली-सी सीढ़ियाँ,
वो धूल से अटी राहें,
दाना चुगते कबूतर,
हवा में फड़फड़ाते उनके पर,
नदी की लहरें
और पानी पर झुकता हुआ वो पुल…
क्यों याद रखो तुम?
शायद इसलिए कि
कुछ जगहें रास्तों में नहीं होतीं,
वे इंसान के भीतर बस जाती हैं।
और कुछ सफ़र
मंज़िल तक पहुँचकर भी ख़त्म नहीं होते—
वे यादों में चलते रहते हैं।
हाँ…
क्यों याद रखो तुम?
याद तो मुझे रखना है।
तुम्हें नहीं।
— अख़्तर
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