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21 अगस्त 2021

निखिल , निखिल , निखिल , कोटा की एक दुर्दांत , अपहरण के बाद हत्या की दिल हिला देने वाली ,, खतरनाक घटना ,, अपराधी पकड़े गए , अब उन्हें सज़ा कैसे मिले , इस पर चिंतन मंथन होना चाहिए

 निखिल , निखिल ,  निखिल , कोटा की एक दुर्दांत , अपहरण के बाद हत्या की  दिल हिला  देने वाली ,, खतरनाक घटना ,, अपराधी पकड़े गए , अब उन्हें सज़ा कैसे मिले , इस पर चिंतन मंथन होना चाहिए ,, समाज इस मामले में मुखर है ,, लेकिन केंडिल मार्च निकालने से , अब कुछ नहीं होगा , सियासत करने से इस मामले में अब कुछ नहीं होगा ,, यह कोटा की एक गंभीर घटना है , परिस्थिति जन्य साक्ष्य ,, कढ़ी से कढ़ी जोड़ने के बाद , अपराधियों तक पहुंचकर , उन्हें सज़ा दिलवाने के प्रयासों की ,, अपवादित घटनाओं    में से विशिष्ठ है , वैसे कोटा पुलिस का अनुसंधान क़ाबिल ऐ तारीफ़ है ,, लेकिन फिर भी , राजस्थान पुलिस ,, फिर कोटा पुलिस  , उपकरणों , एफ एस एल , सहित कई विशिष्ठ , आधुनिक अनुसंधान में अभी भी अपेक्षाकृत सी बी आई के बहुत पीछे है , ऐसे में , निखिल हत्याकांड के मामले में , एफ एस एल , सहित मोबाईल कॉल डिटेल , फिंगर प्रिंट वगेरा , कढ़ी से कढ़ी जोड़ने के मामले में , समाज को , लोकसभा अध्यक्ष जो कोटा के सांसद भी है , उनके ज़रिये , इस मामले की जांच सी बी आई से करवाना चाहिए , ताकि कुछ अतिरिक्त साक्ष्य , कुछ अतिरिक्त आधुनिक उपकरणों के तथ्य भी सामने आ सके , और यह सब केंडिल मार्च  निकालने से नहीं होगा , लोकसभा अध्यक्ष पर दबाव बनाने से होगा ,, यूँ तो इस मामले में , कोटा पुलिस की सराहनीय जांच है  , इसके पूर्व भी ,, सी बी आई जांच  ,मामले में , नीलू राणा हत्याकांड में , कोटा पुलिस  जांच की समर्थित रही है , बस कोटा पुलिस  , के पास उपकरणों , विशेष प्रशिक्षण , एफ एस एल की तात्कालिक जांच रिपोर्ट , सहित कुछ मजबूरियां हैं , जो सी बी आई को विशिष्ठ अधिकार होने से तात्कालिक व्यवस्थाएं हो जाती है , और थोड़ी बहुत ही सही , अतिरिक्त साक्ष्य  ज़रूर मिलती है , ताकि अपराधी को सज़ा दिलवाने में और आसानी हो जाती है  ,,  निखिल  मामले में , समाज केंडिल मार्च नहीं  निकाले , बुद्धिजीवियों क़ानून विदों के साथ बैठकें करें , मशवरा करे ,, हाल ही में समाज ने , कोटा अभिभाषक परिषद को ,  ज्ञापन देकर , अपराधियों की पैरवी नहीं करने  के लिए कहा है , यह सम्भवं नहीं है  ,  क्योंकि भारतीय   क़ानून  ,भारतीय संविधान का  सीधा सिद्धांत  है  के किसी भी व्यक्ति  को  बिना उसका पक्ष सुने ,,  दंडित  नहीं किया जा सकता , उसे बचाव का पूरा अधिकार दिया जाता है  , फिर चाहे उसे सरकारी स्तर पर ही वकील  सरकारी खर्च पर ही उपलब्ध क्यों ना कराना पढ़े ,, इसीलिए सुप्रीमकोर्ट ने , , सामूहिक रूप से किसी भी व्यक्ति के पक्ष में , समूह  को पैरवी से रोकने को अवैध क़रार दिया है  , उनके कर्तव्य के खिलाफ बताया है , निखिल मामले में भी , अगर अभिभाषक परिषद  ,  पैरवी से इंकार  भी कर दे , तो न्यायालय  को  ही  ,  सरकारी स्तर पर , मुफ्त विधिक सहायता के तहत ,  अपराधी  को वकील  हर हाल में उपलब्ध करवाना होगा , ऐसे में केंडल मार्च निकालने और ऐसी मांगों और दिमाग लगाने ,, सियासत करने की जगह , मामले की जांच सी बी आई से भी अतिरिक्त हो ,  ऐसी  व्यवस्था होना चाहिए , जबकि  , मामले में जो गवाह  ,  जो परिस्थिति जन्य साक्ष्य  की बरामदगी , कढ़ी से कढ़ी जोड़ने वाले सामानों की बरामदगी , ,एफ एस  एल , मोबाइल कॉल डिटेल  , लोकेशन वगेरा की ,  साक्ष्य है , उसे  कोर्ट में पेश करने के पहले , सुरक्षित तरीके से  ,  केस ऑफिसर स्कीम  में त्वरित सुनवाई  ,  दिन प्रति दिन सुनवाई व्यवस्था के तहत ,,  गवाहान  को , गवाह  देने के पहले ,,  पुलिस अधिकारी  द्वारा ,  पूरी तरह से  , एक  एक तथ्य बताये , फिर लोक अभियोजक  ,  अपर लोक अभियोजक  के समक्ष  , ऐसे गवाह , पृथक से गवाह  को समझाने के कक्ष की व्यवस्थाएं कर , गवाहान को फर्द बरामदगी ,  सहित हर बिंदु और प्रशिक्षित किया जाए  अपराधी का वकील  , गवाह से बचाव में गुमराह करने के लिए , किस तरह के सवाल करेंगे , और उनका जवाब सत्य पर अटल रहने के लिए किस तरह से आना चाहिए ,  उस  का विशेष पूर्व रिहर्सल , होना ज़रूरी है ,  क्योंकि  ऐसे   मामलों में कढ़ी से कढ़ी टूटी , और बस  ,  पूर्व न्यायिक दृष्टांतों के तहत  अपराधियों को  फायदा मिलने की संभावना बनी रहती है , ऐसे में निखिल  के परिवार , उनके समाज  को  , अब सदमे से उबरना होगा , निखिल  कोटा का बेटा  था ,  उसके न्याय के साथ  , कोटा  का हर नागरिक  ,, हर समाज खड़ा है , में खुद अपनी विधिक जानकारी के साथ , निखिल  के दोषियों  को दंडित करवाने के लिए हर सम्भव  मदद देने का भरोसा दिलाता  हूँ  ,,  लेकिन इस मामले को ,  पूर्व गलतियों  से सबक़ लेकर , परिस्थित जन्य   ,साक्ष्य   कढ़ी से कढ़ी  मिलाने की  व्यवस्था  की पुष्टि करने के लिए  , गवाहान ,  को पूर्व प्रशिक्षण , रिहर्सल , मूक  कोर्ट की तरह समझाइश ,  होना  ही चाहिए  , इसके लिए , जिला कलेक्टर , पुलिस अधीक्षक मिलकर , गवाहों की सुरक्षा , केस ऑफिसर स्कीम में नियुक्त , अधिकारी ,,  गवाहान खर्च , प्रॉसिक्यूशन  को  अतिरिक्त बजट ,  व्यवस्थाओं  ,  समझाइश  कक्ष  जहाँ मूक  कोर्ट की तरह , गवाहान को हर संभावित बचाव पक्ष के सवाल , सहित सभी मुद्दों पर ,पूर्व प्रशिक्षित किया जा सके ,और इस मामले की सुनवाई भी ,  दिन प्रति दिन हो , इसके लिए माननीय हाईकोर्ट से भी निवेदन करवाया जा सके , ताकि कोटा सहित , राजस्थान में , अवैध चौथ वसूली ,लूट को लेकर , ऐसी घिनौनी  ,, घृणास्पद  , नृशंस हत्या , और सुबूत मिटाने की साज़िश करने वाले , अपराधियों  ,  उनके समर्थकों  के  दिलों में खौफ जाग्रत हो सके , और ऐसी न्यायिक प्रक्रिया अपराधियों के खिलाफ , कोटा  ही  नहीं  , राजस्थान  ही नहीं  ,  देश  भर की  न्यायिक  प्रक्रिया  के बाद  ,  साक्ष्य की हुबहु पुष्टि ,  अदालत में करवाकर , संदेह की  ज़रा भी गुंजायश  न रहें और एक मिसाल  क़ायम हो सके ,,  अख्तर खान  अकेला कोटा राजस्थान 

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