राखी के त्यौहार के अवसर पर , बहनों से , सम्पत्ति में रज़ामंदी रहने पर उनका हक़ , छुड़वा कर , क़ानूनी लिखा पढ़ी कर संभावित विवादों का निस्तारण कर लेने का आह्वान , लोक अदालत की भावनाओं से , समझौतों के इस माहौल में क़तई गलत नहीं है ,, कोटा ज़िले में दीगोद के तहसीलदार , दिलीप सिंह प्रजापति , ने रक्षाबंधन के मौके पर ,, भाइयों के घर आयी बहनों से , सम्पत्ति विवादों के निस्तारण के लिए ,, पैतृक खातेदारी मामले में , उनके हक़ त्याग करवाने का सुझाव दिया है ,, जो कोई ज़बरदस्ती नहीं , ऐच्छिक है ,इस पर बवाल किया जाना , न्यायसंगत नहीं , अव्यवहारिक लोग , निश्चित तोर पर , इस मामले में बवाल कर सकते है , लेकिन , जो लोग व्यवहारिक है , क़ानून जानते है , अदालतों में बेवजह के विवादों के बाद , रोज़ , प्यार खुलूस के इन पवित्र रिश्तों का खून होता देखते है , वोह लोग इस अपील , इस सुझाव का निश्चित तोर पर ,, समर्थन करेंगे ,, एक तरफ , लीगल ऑथोरिटी एक्ट के तहत , राष्ट्रीय ,, राज्य , जिला , ताल्लुका स्तर पर , लोक अदालतों के माध्यम से , ऐसे अनावश्यक मामलों को निस्तारण करने के लिए ,केंद्र , राज्य सरकारें , करोड़ों करोड़ रूपये खर्च कर रही है , अदालतें , जिला प्रशासन ,रोज़ मर्रा मशक़्क़त कर रहा है , और दूसरी तरफ , ऐसी व्यवस्था के समर्थन में , दीगोद तहसीलदार ने ,,अगर कोई अपील कर भी दी है , तो वोह सुझाव मात्र है ,जो कई घरों में नफरत की खरपतवार उगने से रोक सकता है , सभी जानते है , दहेज़ के साथ , बाबुल की दुआएं लेती जा , के आंसुओं के साथ , बेटी की बिदाईगी होती है , पढ़ाई लिखाई ,, शादी ब्याह , फिर नाती , नवासे , आवा जाही का प्यार अटूट होता है , निभावना अटूट होता है , बहनों में भाई के लिए अटूट प्यार होता है , बेटी अपने घर में हक़ के साथ आती है , हक़ के साथ रहती है, माँ , बाप नहीं रहे तो भी भाइयों , भाभियों के साथ , त्यौहार मनाती है , खुशिया मनाती है , अपने ससुराल में , स्वाभिमान से , अपने पीहर के क़िस्से सुनाती है ऐसे में बेटी को हिस्सा देने वाला क़ानून हो तो हो , फिर भी बेटियां , यह त्याग , यह समर्पण , यह पूर्व में दिए गए ,उपहार , प्यार , मोहब्बत , नक़द मदद , हिस्सेदारी , देखकर , खुद ही कह देती है , मेरा हिस्सा अब , सम्पत्ति में नहीं है , मन बना लेती है , लेकिन अगर पिता की मृत्यु हो गयी , माँ की मृत्यु हो गयी , तो रूटीन सिस्टम में , नामांतरण नियमों के तहत , सम्पत्ति रिकॉर्ड में चढ़ जाती है , मौखिक त्याग होता है ,, ऐवजी खर्च भी सकरात्मक होते है , फिर अगर ससुराल पक्ष बहकाने वाला हो , बरगलाने वाला हो , तो बस , मौखिक त्याग की गयी सम्पत्ति को लेकर , फिर से कागज़ी नामांतरण होने पर , विवाद शुरू होते है , विवाद होते है , कोर्ट कचहरी तो होते ही है , रिश्ते टूटते है , कई बार फौजदारी , और किराए के गुंडों के साथ , हमले भी होने के क़िस्से सामने आये है , इतने बढ़े वाद विवाद , अपने ही रिश्तेदारों में ,नफरत का पीढ़ियों तक की नफरत का माहौल , रोज़ बना रहता है , जबकि जिस सम्पत्ति के लिए विवाद है , वोह मौखिक रूप से , कई तरह के प्रतिफलों के बदले , स्नेह , के बदले , परित्याग , रिश्तेदारों , पंचों के सामने की जा चुकी है , ऐसे में , जो बहने अपने भाइयों पर जान छीडकती है ,, जो बहने , पूर्व में किये गये वायदे पर अटल है , जो बहने स्वेच्छा से , अपने भाइयों के पक्ष में , हक़ त्याग पत्र लिखने को तय्यार है , ऐसी बहनों के लिए , अगर , रक्षाबंधन पर , घर आने पर , उनसे स्वेच्छिक , बिना किसी दाब दबाव के , कागज़ी हक़ त्याग लिखवाकर , रिकॉर्ड दुरुस्त करने की जनहित में तहसीलदार ने अपील जारी कर दी , तो पहाड़ नहीं टूट गया है , इसे नकारात्मक सोच की तरह नहीं , सकारात्मक सोच की तरह देखना चाहिए , प्रोत्साहन देना चाहिए ,, अनावश्यक विवादों को निस्तारित कर , बहनों के लिए भाइयों का आजीवन प्यार बना रहे , ऐसा स्वेच्छिक सकारात्मक माहौल तय्यार करना चाहिए , हाँ अगर कोई नहीं चाहता , कोई अपनी संम्पत्ति , को लेना चाहता है , किसी के भाई का व्यवहार सही नहीं है , पिता के जीवन काल में , उसकी पढ़ाई , लिखाई , शादी , ब्याह , ज़ेवर , रिश्ते निभाई ,, सहित अतिरिक्त कोई खर्च नहीं मिला है , ,या इन सब के बावजूद भी , वोह स्वेच्छा से ऐसा हक़ त्यागना नहीं चाहती तो , ऐसे लोगों के लिए यह बाध्यकारी अपील थोड़ी है , यह तो स्वेच्छिक है , और अनावश्यक नफरत के माहौल को , खत्म करने के उद्देश्य से , अनावश्यक मुक़दमों के बोझ से सरकारों को बचाने , लोक अदालत की भावना से , विवादों के निस्तारण करने से संबंधित है , ,मुझे गर्व है , के मेरी अम्मी ,,ने अपनी पैतृक सम्पत्ति में ,से एक इंच ज़मीन , भी नहीं ली ,और सभी बहनों ने स्वेच्छिक परित्याग किया है , नतीजन , आज भी खुलूस ,, मोहब्बत के साथ , यह रिश्ते क़ायम है ,, और यूँ प्यार , मोहब्बत , लेन देन के रिश्तों में , हक़ से ज़्यादा ,, आवा जाही भी होती रही है ,,, अख्तर खान
तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे मज़हब के लोग देख कर कहें कि अगर उम्मत ऐसी होती है,तो नबी कैसे होंगे? गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.
23 अगस्त 2021
राखी के त्यौहार के अवसर पर , बहनों से , सम्पत्ति में रज़ामंदी रहने पर उनका हक़ , छुड़वा कर , क़ानूनी लिखा पढ़ी कर संभावित विवादों का निस्तारण कर लेने का आह्वान , लोक अदालत की भावनाओं से , समझौतों के इस माहौल में क़तई गलत नहीं है
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