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23 अगस्त 2021

राखी के त्यौहार के अवसर पर , बहनों से , सम्पत्ति में रज़ामंदी रहने पर उनका हक़ , छुड़वा कर , क़ानूनी लिखा पढ़ी कर संभावित विवादों का निस्तारण कर लेने का आह्वान , लोक अदालत की भावनाओं से , समझौतों के इस माहौल में क़तई गलत नहीं है

 राखी के त्यौहार के अवसर पर , बहनों से , सम्पत्ति में रज़ामंदी रहने पर उनका हक़ ,  छुड़वा कर , क़ानूनी लिखा पढ़ी कर संभावित विवादों का निस्तारण कर लेने का आह्वान , लोक अदालत की भावनाओं से , समझौतों के इस माहौल में क़तई   गलत  नहीं है ,, कोटा ज़िले में दीगोद के तहसीलदार , दिलीप सिंह प्रजापति , ने रक्षाबंधन के मौके पर ,,  भाइयों के घर आयी बहनों से , सम्पत्ति विवादों के निस्तारण के लिए ,, पैतृक खातेदारी मामले में , उनके हक़ त्याग करवाने का सुझाव दिया है ,, जो कोई ज़बरदस्ती नहीं , ऐच्छिक  है ,इस पर बवाल किया जाना , न्यायसंगत नहीं , अव्यवहारिक लोग , निश्चित तोर पर ,  इस मामले में बवाल कर सकते है , लेकिन , जो लोग व्यवहारिक है , क़ानून जानते है , अदालतों में बेवजह के विवादों के बाद , रोज़ , प्यार खुलूस के इन पवित्र रिश्तों का खून होता देखते है , वोह लोग इस अपील , इस सुझाव का निश्चित तोर पर ,, समर्थन करेंगे ,, एक तरफ ,  लीगल ऑथोरिटी एक्ट के तहत , राष्ट्रीय ,, राज्य , जिला , ताल्लुका स्तर पर , लोक अदालतों के माध्यम से , ऐसे अनावश्यक मामलों को निस्तारण करने के लिए ,केंद्र , राज्य सरकारें , करोड़ों करोड़ रूपये खर्च कर रही है , अदालतें , जिला प्रशासन ,रोज़  मर्रा मशक़्क़त कर रहा है , और दूसरी तरफ , ऐसी व्यवस्था के समर्थन में , दीगोद तहसीलदार ने ,,अगर कोई अपील कर भी दी है , तो वोह सुझाव मात्र है ,जो कई घरों में नफरत की खरपतवार उगने से रोक सकता है , सभी जानते है , दहेज़ के साथ , बाबुल की दुआएं लेती जा , के आंसुओं के साथ , बेटी की बिदाईगी होती है , पढ़ाई लिखाई ,, शादी ब्याह , फिर नाती , नवासे , आवा जाही का प्यार अटूट होता है , निभावना अटूट होता है , बहनों में भाई के लिए अटूट प्यार होता  है , बेटी अपने घर में हक़ के साथ आती है ,  हक़ के साथ रहती है,  माँ  ,  बाप   नहीं रहे तो भी भाइयों , भाभियों  के साथ , त्यौहार मनाती है , खुशिया मनाती है , अपने ससुराल में ,  स्वाभिमान से , अपने पीहर के क़िस्से सुनाती है  ऐसे में बेटी को हिस्सा देने वाला क़ानून हो  तो हो ,  फिर भी बेटियां ,  यह त्याग , यह समर्पण ,  यह पूर्व में दिए गए  ,उपहार , प्यार , मोहब्बत , नक़द मदद ,  हिस्सेदारी ,  देखकर ,  खुद  ही कह देती  है , मेरा हिस्सा अब ,  सम्पत्ति में नहीं है ,  मन  बना  लेती है  ,  लेकिन अगर पिता की मृत्यु हो गयी , माँ की मृत्यु हो गयी  , तो रूटीन सिस्टम में , नामांतरण नियमों  के तहत ,  सम्पत्ति रिकॉर्ड में चढ़ जाती है  , मौखिक  त्याग होता है ,,  ऐवजी  खर्च  भी सकरात्मक होते है   ,  फिर अगर ससुराल पक्ष  बहकाने वाला हो , बरगलाने वाला हो , तो बस  ,  मौखिक  त्याग की गयी सम्पत्ति को लेकर , फिर से कागज़ी नामांतरण होने पर , विवाद शुरू होते है  ,  विवाद होते है  , कोर्ट कचहरी तो होते ही है , रिश्ते टूटते है  ,   कई बार फौजदारी , और किराए के  गुंडों के साथ ,   हमले भी  होने के क़िस्से सामने आये है , इतने बढ़े वाद विवाद , अपने ही रिश्तेदारों में ,नफरत का पीढ़ियों तक   की नफरत का माहौल ,  रोज़  बना रहता है , जबकि  जिस  सम्पत्ति के लिए विवाद है , वोह मौखिक  रूप से , कई तरह के प्रतिफलों के बदले , स्नेह  ,  के बदले , परित्याग ,  रिश्तेदारों , पंचों  के सामने  की जा  चुकी  है , ऐसे में  , जो बहने अपने भाइयों पर जान  छीडकती है ,,  जो बहने ,  पूर्व में किये गये वायदे पर अटल है , जो  बहने स्वेच्छा से , अपने भाइयों के पक्ष में , हक़ त्याग पत्र लिखने को तय्यार है  , ऐसी  बहनों के लिए , अगर , रक्षाबंधन पर , घर आने पर , उनसे स्वेच्छिक , बिना किसी दाब दबाव के , कागज़ी हक़ त्याग लिखवाकर , रिकॉर्ड दुरुस्त करने की जनहित में तहसीलदार ने अपील जारी कर  दी , तो पहाड़ नहीं टूट गया है , इसे नकारात्मक सोच की तरह नहीं , सकारात्मक सोच की तरह देखना चाहिए , प्रोत्साहन देना चाहिए ,,  अनावश्यक विवादों को निस्तारित कर , बहनों के लिए भाइयों का आजीवन प्यार बना रहे ,  ऐसा स्वेच्छिक सकारात्मक माहौल तय्यार करना चाहिए , हाँ अगर कोई नहीं चाहता , कोई  अपनी संम्पत्ति , को लेना चाहता है , किसी के भाई का व्यवहार सही नहीं है , पिता के जीवन काल में , उसकी पढ़ाई , लिखाई , शादी , ब्याह , ज़ेवर , रिश्ते निभाई ,,  सहित अतिरिक्त कोई खर्च नहीं मिला है , ,या इन सब के बावजूद भी , वोह स्वेच्छा से ऐसा हक़ त्यागना नहीं चाहती तो , ऐसे  लोगों के लिए यह बाध्यकारी अपील थोड़ी है , यह तो स्वेच्छिक है , और अनावश्यक नफरत के माहौल को , खत्म करने के उद्देश्य से , अनावश्यक मुक़दमों के  बोझ  से सरकारों को बचाने , लोक अदालत की भावना से , विवादों के निस्तारण करने से संबंधित है , ,मुझे गर्व है , के मेरी अम्मी ,,ने अपनी पैतृक सम्पत्ति में ,से एक  इंच ज़मीन  , भी  नहीं  ली  ,और सभी बहनों ने स्वेच्छिक परित्याग किया है , नतीजन , आज भी  खुलूस ,,  मोहब्बत के साथ ,  यह रिश्ते क़ायम  है ,,  और  यूँ  प्यार ,  मोहब्बत , लेन देन के रिश्तों में ,  हक़ से ज़्यादा ,,  आवा जाही  भी  होती रही है ,,, अख्तर खान

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