राजस्थान में सत्तापरिवर्तन की हुंकार के साथ विधानसभा चुनाव सर पर है
,,ऐसे में ,,कर्त्तव्यविहीन पक्षपात करने वाले कर्मचारी ,अधिकारी ,,खासकर
पुलिसकर्मियों की कर्तव्यों की उपेक्षा पर उनकी नौकरी खतरे में पढ़ सकती है
,सियासत में सत्ता परिवर्तन के बाद महत्वपूर्ण पोस्टों पर ,,क़ाबिल
,,निष्पक्ष अधिकारीयों की नियुक्ति नहीं सिर्फ ,चमचे ,चापलूस ,इशारों पर
नाचने वाले अधिकारी ही रसमलाई पोस्टों पर लगाए जाते है ,,जबकि सियासी
द्वेषता के कार्यकर्ता बनकर कामकरने वाले सरकारी कर्मचारी दुःख तो उठाते है
,राजस्थान सरकार के ग्रह विभाग ने पुलिस अधिकारीयों द्वारा कोंग्निजेबल
अपराध में तुरंत मुक़दमा दर्ज नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ
अनुशासनात्मक कार्यवाही किये जाने का परिपत्र जारी किया है ,सुप्रीमकोर्ट
के ललितकुमारी वाले निर्देशों की अनुपालना सही तरीके से करने और फौजदारी
क़ानून में संशोधन के हवाले के साथ राजस्थान सरकार के गृहविभाग ने 30 जुलाई
2018 को विस्तृत आज्ञापक परिपत्र जारी कर सभी पुलिसअधिकारीयों को चेतावनी
दी है ,जिसमे कॉग्निजेबल अपराध में मुक़दमा दर्ज नहीं करने पर अनुशासनात्मक
कार्यवाही की चेतावनी है ,ऐसे में वर्तमान हालातों में चुनावी उपजे विवाद
सहित आई पी एस पंकजचौधरी ,उनके ससुराल पक्ष का जो विवाद सामने आया है ,ऐसे
कई विवाद थानाधिकारियों को मुसीबत में डाल सकते है ,,,,परिपत्र में ऐसी
शिकायतों पर दोषी अधिकारीयों के खिलाफ गंभीर कार्यवाही की चेतावनी है ,वैसे
फौजदारी संशोधित क़ानून में अब कॉग्निजेबल अपराध में मुक़दमा दर्ज नहीं करने
वाले थानाधिकारी के खिलाफ उसी थाने में 166 ऐ बी में मुक़दमा दर्ज होगा
,ऐसे अपराध के लिए थानाधिकारी के खिलाफ कार्यवाही में 197 सी आर पी सी के
तहत राजकीय स्वीकृति की ज़रूरत भी नहीं होगी ,परिपत्र में ललितकुमारी के
सुप्रीमकोर्ट न्यायिक निर्णय का भी हवाला है जिसकी गलत व्याख्या पर नाराज़गी
जताते हुए कहा है अधिकतम सात दिवस की परिवाद जांच की समय सीमा है ,जो
सुप्रीमकोर्ट की फुलकोर्ट ने अधिकतम 15 दिन बढ़ाई है ,ऐसे में अब किसी भी
रिपोर्ट पर अधिकतम 15 दिन में जांच सुरक्षित रखने का पुलिस अधिकारी को
अधिकार है ,अगर इसके बाद भी संज्ञेय अपराध होना साबित है ,फिर भी अगर
मुक़दमा निश्चित समयसीमा में दर्ज नहीं होता है ,तो ऐसे थानाधिकारी के खिलाफ
गंभीर कार्यवाही होगी ,,परिपत्र में पुलिस अधिनियम की धरा 31 का भी हवाला
दिया गया है जिसमे ऐसे दोषी लोगो के खिलाफ कार्यवाही की बाध्यता है ,,जो
संज्ञय अपराध साबित होने पर भी मुक़दमा दर्ज नहीं करने के दोषी है ,,ऐसे
दोषी अधिकारीयों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही भी होगी ,,परिपत्र में
में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 19 का
हवाला है ,,जिसमें पुलिसअधिकारी के खिलाफ अधिनियम की धारा 21 दंडात्मक
कार्यवाही छ माह की सज़ा का प्रावधान का हवाला ,है इसी तरह से अनुसूचित जाति
1989 अधिनियम की धारा 4 में कर्तव्यों की उपेक्षा मुक़दमा दर्ज नहीं करने
,अनुसंधान सही नहीं करने पर छह माह की सज़ा का प्रावधान है ,,जबकि भारतीय
दंड संहिता के संशोधन 166 ऐ जिसमे महिलाओं के विरूद्ध अपराध में मुक़दमा
दर्ज नहीं करने के दोषी अधिकारी के खिलाफ दो वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान है
जो न्यूनतम छह माह की होगी ,,उक्त आदेशात्मक परिपत्र में सभी
थानाधिकारियों ,पुलिस वरिष्ठ अधिकारीयों को भी चेताया गया है ,,अब देखते है
तत्काल सुचना पर मुक़दमे में टालमटोल करने वाले अधिकारीयों के खिलाफ
दंडात्मक फौजदारी मुक़दमे कितने दर्ज करवाए जाते है और ऐसे दोषी अधिकारीयों
में से कितने अधिकारीयों के खिलाफ पुलिस अधिनियम की धारा 31 के तहत
कार्यवाही होती है ,यह सब क़ानूनविद ,,न्यायविद ,समाजसेवक ,जागरूक लोगो की
जागरूकता पर ही निर्भर होगा ,ऐसे दोषी अधिकारीयों के खिलाफ अब क्या
कार्यवाही होगी ,देखते है ,जागरूकता के एक ब्रेक के बाद
,,,,,,,,,,,,,,,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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