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26 अगस्त 2017

कितना बेबस है ,,राष्ट्रिय और राज्य मानवाधिकार आयोग

कितना बेबस है ,,राष्ट्रिय और राज्य मानवाधिकार आयोग जो सत्ताईस सालों में क़ानूनी आदेश के बावजूद भी ज़िलों में मानवाधिकार न्यायलय स्थापित नहीं करवा सके ,,,,मज़ेदार बात यह है के सरकारें जैसे आम लोगो को गुमराह करती है ऐसे ही राजस्थान सरकार ने वर्ष 2013 चार साल पहले कागज़ो में मानवधिकार का काम ज़िलों के जिला न्यायधीश को दिए है ,,लेकिन सिर्फ यह अदालते कागज़ो में है ,,,पिछले दिनों ,राजस्थान मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश टाटिया ने वकीलों के एक कार्यक्रम में जागरूक वकीलों के सामने जब जिला जज को सम्बोधित करके सवाल किया के ,,ज़िलों में वर्ष 2015 से मानवाधिकार न्यायालय काम कर रही है लेकिन इसकी जानकारी जिला जज को भी नहीं है ,कितनी अफसोसनाक ,,कितनी शर्मनाक बात है के एक जिला जज जिन्हे मानवाधिकार न्यायालयों की ज़िम्मेदारी भी दी हो उन्हें और पुरे राजस्थान के ज़िलों के जजों को इसकी जानकारी न रही हो ,,मिडिया को ,,मानवाधिकार मामलो के एक्टिविस्टों को भी इन अदालतों की जानकारी न हो ,,खुद वकीलों ,,उनके निर्वाचित पदाधिकारियों को इस न्यायालय की जानकारी न हो ,खेर ,,हमने ह्यूमन रिलीफ सोसाइटी के महसचिव होने के नाते ,,एक मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते इस मामले में खोजबीन की ,,एक मित्र ,,अभिन्न मित्र ,विनम्र मित्र ,, ने मेरी इस मामले में मदद की ,जस्टिस टाटिया ने मानवाधिकार न्यायालय 2015 में खुलना बताया इसलिए खोजबीन 2015 के परिपत्रों तक सीमित थी ,,,लेकिन मेरे इस विनम्र हर दिल अज़ीज़ मित्र ने ,सभी परिपत्र खंगाले और आखिर कागज़ो में चल रही ,,मानवाधिकार न्यायलय को हमने खोज ही निकाला ,,खुद शर्मसार भी हुए ,,ताज्जुब और सरकारी सिस्टम खासकर ,,मानवाधिकार आयोग की जागरूकता पर अफ़सोस भी हुआ ,,करोड़ करोड़ रूपये जिस सिस्टम को जागरूक करने को लेकर खर्च हो रहे ही वोह सिस्टम फेल्योर साबित हुआ ,,,वर्ष 2013 में राजस्थान के प्रमुख विधि सचिव ने महामहीम राज्यपाल 3 मई 2013 को तत्काल प्रभाव से सभी जिला जजों को अपनी क्षेत्रीय सीमा के लिए ,,मानवाधिकार अदालत का जज अधिसूचित किया था ,,चार सालो में सरकार ने इस मानवाधिकार न्यायलय के संचालन के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई ,आयोग ने मॉनिटरिंग नहीं की ,,वकील नियुक्त नहीं हर इंफ्रा स्ट्रक्चर ,,बाबू ,,स्टाफ नहीं दिया गया ,,जजों ने भी इस परिपत्र को देखा और पत्रावली में संलग्न कर अलमारी में रखवा दिया ,,हम हर साल दस दिसम्बर को जिस अदालत के गठन को लेकर ज्ञापन देते रहे ,,सुचना के अधिकार के तहत ऐसा नहीं करने के कारण जानते रहे ,,इधर सरकार ने चोरो की तरह परिपत्र जारी ,,किया ,हमारे विधायक ,,हमारे सांसद ,,,खुद मानवाधिकार आयोग इस मामले में अँधेरे में रहा ,,,ताज्जुब इस बात पर और हुआ के अब जब ,,राजस्थान के मानवाधिकार आयोग को सरकार के ,,इन न्यायालयों की उपेक्षित कार्यवाही का पता चल चूका है तो हाईकोर्ट और सरकार को इन अदालतों के संचालन के लिए उन्होंने सरकार को कोई फटकार नहीं लगाई न ही ,,कोई आदेश पत्र जारी किया ,,ह्यूमन रिलीफ सोसायटी के अख्तर खान अकेला ,,आबिद अब्बासी की तरफ से इस मामले में विस्तृत ज्ञापन राजस्थान हाईकोर्ट ,,राजस्थान सरकार को भेजा गया है ,,देखते है अखबारों में खासकर बढे अखबारों में अदालतों की खबर संकलन के लिए जिन्होंने अलग से पत्रकार को नियुक्त किया है ,,अलग से बीट बनायी है वोह अख़बार ,, उन अखबारों के पत्रकार की खोजबीन करते है ,,मानवाधिकार आयोग क्या करता है ,,एक्टिविस्ट क्या करते है ,,और उत्पीड़न से शीघ्र इंसाफ दिलाने वाली यह ,,कागज़ो में चार सालो से चल रही ,,मानवाधिकार जिला न्यायालय ,,,कब लोगो को भौतिक रूप से सुनवाई शुरू कर इन्साफ दिलाना शुरू करती है ,कब इस न्यायालय का बोर्ड ,इस न्यायालय का क्षेत्राधिकार ,,इस न्यायालय के सरकारी वकील ,,,अपना कार्य शुरू करते है ,,,इन्तिज़ार ,,इन्तिज़ार ,,इन्तिज़ार ,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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