बुधवार 23 अगस्त को में कोटा से बाहर था ,,कोटा अभिभाषक परिषद में राजस्थान
मानवाधिकार आयोग के चेयरमेन जस्टिस प्रकाश टाटिया चौंकाने वाली जानकारी
देकर गए ,,,उन्होंने बताया ,, कोटा में वर्ष 2015 से ही मनवाधिकार न्यायालय
काम कर रही है ,,यहां जज साहिब अधिसूचित होकर इस मामले में कार्यरत है
जबकि एक लोकअभियोजक भी नियुक्त है ,,मेने आज इस खबर को अख़बार में पढ़ा
,,अफ़सोस हुआ मेरे अपने अल्पज्ञान पर ,,मेरे अभिभाषक परिषद के पदाधिकारी रहे
साथियो के अल्पज्ञान पर ,,,इससे भी ज़्यादा अफ़सोस कोटा के
पत्रकारों पर हुआ ,,एक क़ानूनी रूप से एक अदालत का गठन दो वर्ष पूर्व कोटा
में हुआ ,,अधिसूचना हुई ,एक लोकअभियोजक नियुक्त हो गया ,,और कोटा के लोगो
को पता ही नहीं ,,,कोई खोज खबर नहीं ,,अभिभाषक परिषद के नेतृत्व निर्वाचित
नेतृत्व जो उस वक़्त से अभी तक है पता ही नहीं ,,रोज़ अदालत में जाने वाले
वकील को दो वर्षो से चल रही इस अदालत का कहीं बोर्ड भी नज़र नहीं आया ,,इस
अदालत में कोन ,,बाबू ,,कोन रीडर है कुछ पता नहीं ,,,किसी भी अख़बार में कोई
खबर नहीं ,,खोजी पत्रकारों तक को इस भेद का पता नहीं ,,वर्ष 1993 से हर
साल विश्व मानवाधिकार दिवस 10 दिसम्बर को में इस मांग को लेकर केंद्र और
राजस्थान सरकार को ज्ञापन भेजता हूँ ,मुझे पता नहीं ,,राजस्थान हाईकोर्ट की
वेबसाइट पर इसकी सुचना नहीं ,,,मानवाधिकार अदालत में दो सालों में एक
मुक़दमा भी नहीं ,,खेर में तो बाहर था होता तो कई क्रॉस सवालात इस मामले में
जस्टिस प्रकाश टाटिया से करता ,,अपनी जिज्ञासा शांत करता ,,लेकिन जो लोग
मौजूद थे ,,कितने भोले ,,कितने शरीफ थे जो जस्टिस टाटियां ने कोटा में
मानवाधिकार आयोग 2015 से स्थापित होकर संचायलित होने और एक लोकअभियोजक की
नियुक्ति भी होने की सुचना दी और सब सुनकर चुप रहे ,,मुझे अफ़सोस तब हुआ जब
कोटा के खोजी पत्रकारो ने इस खबर को खबर बनाया ,,लेकिन सर्किट हाउस में
जाकर या समारोह में ही जस्टिस प्रकाश टाटियां से इस मामले की अधिसूचना ,,इस
मानवाधिकार अदालत के बारे में प्रचार प्रसार में कोताही क्यों बरती गयी
,,अब तक इस अदालत में एक भी मुक़दमा क्यों दर्ज नहीं हुआ ,,,मानवाधिकार
मामलों की परिभाषा खुद क़ानून में है जो किसी व्यक्ति के अधिकराओ का हनन
करता है वोह मानवाधिकार हनन के मामले है ,,अभी कल ही एक अदालत ने नाजायज़
पुलिस हिरासत के मामले में एक पुलिस अधिकरी के खिलफ प्रसंज्ञान लिया है ऐसे
ही मामले इस अदालत में ट्रांसफर कर दिए जाते ,,अगर कोटा की अदालत में एक
मामला भी सुनवाई नहीं हुआ तो इसके लिए आयोग की तरफ से क्या पहल हुई उस
मामले में कोई कार्यवाही की जाती ,,लेकिन हम जानते ही वर्ष 1993 ,में बना
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ,,,खुद का क़ानून 25 सालों में भी सरकार से खुद
का क़ानून लागू नहीं करवा पाया है ,,जो जनसुनवाई कर इन्साफ की पहल में
प्रश्नचिन्ह ही ,,क्योंकि मानवाधिकार न्यायालय इसका जवाब है ,,,,,अख्तर खान
अकेला कोटा राजस्थान
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