दोस्तों एक ग्रामीण परिप्रेक्ष के पक्षकार ने आज मेरी आँखें खोल दी
,,अदालतों में लम्बित मामलों को लेकर ऐसे सटीक सवाल दागे के में खुद ला
जवाब हो गया ,,कल कोटा अभिभाषक परिषद की किसी भी वकील की मृत्यु पर शोक सभा
के दौरान कार्यस्थगन होने पर भी न्यायालयों द्वारा वकीलों को अदालत में
उपस्थित होकर काम करने के लिए मजबूर करने के खिलाफ रणनीति तैयार करने के
लिए आम सभा थी ,,अध्यक्ष रघु गौतम का निर्णय था के कार्यबहिष्कार के निर्णय
का सख्ती से वकील साथी पालना करेंगे अन्यथा उन्हें जुर्माना देना होगा और
उनकी सदस्य्ता भी खत्म की जा सकती है ,,अख़बार में कल और आज इस मामले में
जिला जज का पक्ष भी था ,,,हम आज अदालत में बैठे थे इसी दौरान राजस्थान
हाईकोर्ट में विचाराधीन एक मुक़दमे के मामले में जानकारी करने एक सज्जन आये
,,हमने कहा के अभी तो प्रकरण लम्बित है और वैसे भी हाईकोर्ट में एक महीने
का अवकाश है ,,,,,ग्रामीण का सवाल था के कोटा में क्यों हड़ताल है ,,मेने
उसे समझाया के हाईकोर्ट का एक परिपर्टर जजों के नाम आया है जिसमे हाईकोर्ट
ने वकीलों द्वारा कार्यस्थगन किये जाने पर कोई सहयोग नहीं कर अदालत का काम
यथावत चलाने के निर्देश है ऐसे में वकील की मृत्यु के दौरान भी जज काम
जारी रखने को मजबूर है ,,ग्रामीण का सवाल था के इसका मतलब हाईकोर्ट से कई
गुना ज़्यादा मामले इन कोर्टों में लम्बित है ,,मेने बताया के हाईकोर्ट में
ज़्यादा मामले लम्बित है इसीलिए सालों सुनवाई में लग जाते है ,,बस ग्रामीण
की बात समझ में आई उसने बढ़े चटकीले अंदाज़ में कहा के वाह वकील साहब किसी
सरकार है ,,केसा विधि मंत्रालय है केसा अदालतों का निज़ाम है जहाँ हज़ारों
मामले पेंडिंग है हाइक्रोट और सुप्रीम कोर्ट में सालों से लम्बित मामलों की
सुनवाई का इन्तिज़ार है वहां तो हमारी सरकार ने हाइक्रोट और सुप्रीम कोर्ट
को साल में पूरी एक महीने जून की छुट्टी का प्रावधान रखा है सर्दियों की
छुट्टी दीपावली की छुट्टी और दूसरी छुट्टियां शनिवार को कोई सुनवाई नहीं
ऐसे में मामले तो लम्बित होंगे ,,ग्रामीण का सुझाव था के जब भी कोई गरीबों
की सुनवाई वाली सरकार आई कोई हाईकोर्ट मुख्य न्यायधीश गरीबों के हित की सोच
वाले आये तो वोह हाईकोर्ट जजों की यह अनावश्यक छुट्टियां जिस कारन से
हाईकोर्ट में मुक़दमों का और अम्बार लगता है पक्षकार जनता परेशान होती है इन
को समाप्त कर कार्य करने के निर्देश देंगे ,,,,,ग्रामीण ने फिर कहा के
अख़बार मिडिया कहा गए वोह जनता और पक्षकारों की इस व्यथा सरकार के छोटी
अदालतों और बढ़ी अदालतों के संचालन में यह दोहरा मापदंड के बारे में कोई खबर
नहीं बनाते ,,छोटी अदालतों पर तो वकीलों के मरने पर भी काम करने का दबाव
और बढ़ी अदालतों को बेवजह की महीनो की छुट्टिया अजीब अँगरेज़ राज है आज भी इस
देश में ,,एक धोती कुर्ते में लकड़ी टेकते हुए आये इस ग्रामीण बुज़ुर्ग के
सवाल और जवाब को सुनकर में आवाक था ,,में सोचने पर मजबूर था के सिस्टम में
गड़बड़ नहीं बहुत गड़बड़ है मेने सोचा एक पोस्ट तो बनती है शायद अख़बार के
संपादक ,,,इलेक्ट्रॉनिक मिडिया से जुड़े लोग छोटी और बढ़ी अदालतों में सुनवाई
के कार्यदिवसों के इस भेदभाव का पोस्टमार्टम कर राष्ट्रपति ,,विधिमंत्रालय
,,हाईकोर्ट ,,सुप्रीमकोर्ट को सोचने पर मजबूर होना पढ़े और शायद छोटी कोर्ट
और बढ़ी कोर्टों की सुनवाई के दिन बराबर के हो जाए शायद इस जागरूकता से
हाइक्रोट और सुप्रीमकोर्ट में जो हज़ारो अपील सुनवाई के इन्तिज़ार में है
उनकी सुनवाई जल्दी शुरू हो जाए और लोगों को त्वरित सस्ता न्याय मिलने का
रास्ता खुले इस जागरूकता के लिए मिडिया अपनी क्या ज़िम्मेदारी निभाता है
क्या जागरूकता दिखाता है देखने की बात है ,,,,,,,,,,अख्तर खान अकेला कोटा
राजस्थान
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