
मुझे पता है
तुम्हारी आँखों में
हाँ तुम्हारी आँखों में
में उतर गया हूँ
तुम्हारी आंख की
किरकिरी बन कर ॥
सोचता हूँ
जब तुम
तुम्हारी आँख से मुझे
दिल में ना उतार पति हो
तो तुम्ही बताओं
क्यूँ ना में एक
आंसू बनकर
तुम्हारी आँखों से बहकर
तुमसे रिश्ता तोड़ जाऊं
बस
खुदा से इल्तिजा यही है
के तुम्हारी आँख से
मेरा अक्स मेरी याद
बहा देने के लियें
जब भी कोई आये आंसू
वोह आंसू ख़ुशी का हो वोह आंसू ख़ुशी का हो .....अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
आपकी रचना बहुत कुछ सिखा जाती है.
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