आपका-अख्तर खान

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18 फ़रवरी 2011

में शमा हूँ तो क्या ............

में शमां हूँ
तो क्या
तुम परवाने हो
मेरा क्या
में तो बस
एक रात
में ही जल कर
बुझ जाउंगी
फिर नई रात आएगी
नई शमा आएगी
उढ़ते हुए परवानों को
पास बुलाएगी
और फिर
उन्हें
तडपा तडपा कर
जलायेगी
तुम तो खुदा हो
रोक सकते हो तो रोक लो
बरसों से
चल रहे इस सिलसिले को
नहीं ना
नहीं रुकता हे
यह सिलसिला
तो फिर क्यूँ
यूँ ही मुझे
दोष देते हो
रात के अंधेरों में
मुझे जला कर
जिंदगी खुद की रोशन यूँ क्यूँ करते हो ............ । अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

2 टिप्‍पणियां:

  1. तुम तो खुदा हो
    रोक सकते हो तो रोक लो
    बरसों से
    चल रहे इस सिलसिले को
    ...
    chup n raho , kuch kaho yaa niruttar ho gaye ?
    bahut achhi rachna ... kripya vatvriksh ke liye mail karen

    जवाब देंहटाएं
  2. घबरा जायेगा बेचारा शायद इसलिये निरुत्तर हो गया…………सुन्दर अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं

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