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21 अप्रैल 2020

21 अप्रैल 1938 को डा० मोहम्मद अल्लामा इक़बाल इस दुनिया ए फानी से रुख्सत कर ग‌ए

आज ही के दिन 21 अप्रैल 1938 को डा० मोहम्मद अल्लामा इक़बाल इस दुनिया ए फानी से रुख्सत कर ग‌ए लेकिन अपने उर्दू और फ़ारसी कलाम और उसमें जो पैग़ाम दिया है उम्मत को वो हमेशा दिलों और दिमाग़ो को रौशन करते रहेंगे।.....
मेरे लिए इस दौर में क़ुरआने मज़ीद के लिए ऐजाज़ और मोजज़ा होने के लिए सबसे बड़ी दलील अल्लामा इक़बाल की शख्सियत है ।
वजह क्या है!??
अल्लामा इक़बाल उल्मा या मदारिस के तबक़े से नहीं थे , ज़ाहिर सी बात है कि जिनके दिन और रात ज़िक्रे इलाह और इश्के मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़िक्र में गुज़रते हैं उनके दिल मे तो कुरआन की अज़मत होना ही चाहिये!----- ---- लेकिन ऐसा शख्स जिसका तालीमी ताल्लुक कॉलेजों यूनिवर्सिटीज़ से था , जिसने मशरिक ओ मग़रिब के फलसफे खँगाल डाले और वह भी उस दौर में जब अंग्रेज़ हमारे हाकिम थे और मग़रिब से मरउबियत बहुत शदीद थी,
जब एक शख्स उस दौर में वेस्टर्न यूनिवर्सिटीज़ से तालीम हासिल करके आता तो खड़े होकर पेशाब करने को बाअसे फख्र समझता , उनकी तहज़ीब उनका तमद्दुन उनकी लिविंग स्टाइल के क़सीदे पढ़ता हुआ आता था ।
लेकिन अल्लामा खुद कहते हैं कि.... मैं इस आग में डाला गया हूँ मिस्ले ख़लील अलै. हज़रते इब्राहिम अलै. को जिस तरह धधकते आग में फेंका गया था इस तरह मुझे अल्लाह ने वेस्टर्न तहज़ीब के अलाओ लाकर फेंक दिया , मैं इस धधकती आग से होकर आया हूँ
" दयारे मग़रिब के रहने वालो खुदा की बस्ती दुकान नहीं है"
जर्मनी और इंग्लैंड के फ़लसफ़े खंगालने के बाद उसे अगर तस्किन हासिल हुई , उसके इल्म की प्यास अगर बुझी तो सिर्फ कुरआन से ।
" न कहीं जहाँ में अमा मिली ... जो अमा मिली तो कहाँ मिली
मेरे जुर्म ए खाना खराब को ..तेरे उफुव ए बन्दा नवाज़ में"
आखरी ज़िन्दगी में अल्लामा का सिर्फ एक काम रह गया था क़ुरआन की तिलावत करना ।
अपने खादिम को घर की लाइब्रेरी से तमाम फ़लसफ़ा और किताबों को हटा ने के हुक़्म के साथ ही फ़रमाते हैं कि मुझे बस कुरआन काफ़ी है
सय्यद अज़ीर नियाज़ी जैसा सहाफी ए वक़्त खुद गवाही देता है कि मैंने इक़बाल से पूछा कि आपके फ़लसफ़ा ए खुदी का सोर्स क्या है!???
इक़बाल ने कहा कल मेरे घर आइये , मैं आपको नोट करा दूंगा!----- वह बहुत एक्साइटेड थे कि अल्लामा इक़बाल खुद मुझे अपना सोर्स बताएंगे ..... अगले दिन कापी पेन लेकर पहुंच गए ।
अल्लामा इक़बाल ने कहा कि मेरी कुरआन उठा लाओ ,,
वह हैरानी से क़ुरआन उठा लाये लेकिन सोंच में पड़ गए कि इस वक़्त अल्लामा ने कुरआन क्यों मंगवाई ।
कहा कि सूरः हश्र का आखरी रुकू का तर्जुमा पढ़ो!
तर्जुमा: " ए लोगो उन लोगों के मानिंद न हो जाना कि जिन्होंने अल्लाह को भुला दिया , और फिर अल्लाह ने उन्हें अपनी खुदी से गाफ़िल कर दिया , यही वह लोग हैं जो फ़ासिक़ हैं "
वह शख़्स जिसने यूरोप में अपना इल्मी लोहा मनवाया है अगर वह शख्स यह कहता है कि मेरी खुदी , मेरी फ़िक्र , मेरे फ़लसफ़े का सोर्स क़ुरआन मज़ीद है तो यह इस बात की वाजेह दलील है कि क़ुरआन आज भी एक मोजज़ा है ........ अल्लामा मरहूम इसरार रह. का बयान ।
ज़रा सोंचिये कि आज इक़बाल कहाँ है ?
आज इक़बाल कल्माये तौहीद दहाड़ लगाते नौजवानों के क़ल्ब में है
आज इक़बाल तेरा मेरा रिश्ता क्या .. ला इलाहा इल्लल्लाह की सदा बुलन्द करतीं मुट्ठियों में सूरते इंकलाब है ।
आज इक़बाल उस अकेली तलवार की धार में है जो मलूकीयत और वतनियत के शिर्क , जम्हूरियत की अकीदतमंदों पर एक सदी से मुसलसल कारी ज़र्ब लगा रही है
-------- इक़बाल एक शायर है , या फिर शायर ए मशरिक़ है , या उसके फ़लसफ़े की शक्ल शायरी है , या वह हक़ीम उल उम्मत है , बानीय पाकिस्तान है , तफसिरुल क़ुरआन है , एक विज़नरी रहबर है , या फिर उम्मत के ग्लोबल कॉन्सेप्ट और इकामते दीन ए इलाह की इल्हामी आवाज़ है ।
इक़बाल तो खुद इक़बाल से वाकिफ़ नहीं है , इस बात को बस इस तरह देखा जा सकता है कि
जिसमें जितना ज़र्फ़ होगा , वह उसी हद तक ही इक़बाल को जान सकता है ।
" हम पूछते हैं मुस्लिम आशिक़ मिजाज़ से
उल्फ़त बुतों से है तो ब्राह्मण से बैर क्यों "?😁
कापी

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