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07 नवंबर 2018

दीपावली में अली ,,रमज़ान में राम ,,फिर बेवजह क्यों झगड़ते हो तुम

दीपावली में अली ,,रमज़ान में राम ,,फिर बेवजह क्यों झगड़ते हो तुम ,,क्यों करते हो नफरत का महासंग्राम ,,आओ एक दूसरे को गले लगाए ,,,गिले शिकवे मिटाये ,,नफरत भुला दे मोहब्बत का दे पैगाम ,मिल कर गाये तराना हम सब ,सारे जहां में कुछ नहीं अच्छा ,सारे जहाँ से ,अच्छा है सिर्फ हमारा हिन्दुस्तान ,,जी हाँ दोस्तों त्योहारों की गंगा जमुना तहज़ीब ,,मोहब्बत का पैगाम हिन्दू मुस्लिम के नाम यही हमारी रिवायत है ,यही हमारा इतिहास है ,,त्योहारों में भी एक दूसरे से नफरत त्योहारों की रिवायतों ,तोर तरीकों पर आपत्तियां ,,कुछ अजीब सा नहीं लगता ,?,ऐसा तो मेरा हिन्दुस्तान नहीं ?,,खेर सुनो ,सबसे पहले ,,पुर खुलूस अंदाज़ में बुराई पर अच्छाई की जीत के जश्न ,,दीपावली पर सभी भाइयों ,बहनों ,बुज़ुर्गो ,माताओं को मुबारकबाद ,,बधाई ,,आप सभी को जो मेरी उम्र के है ,मेरी उम्र के नज़दीक है ,,मुझ से ज़्यादा उम्र के है ,,उन्हें सभी को पता है ,पहले स्कूल की किताबों में मोहब्बत के पाठ पढ़ाये जाते ,थे ,सरकारें मोहब्बत सिखाती थी ,,सरकार में आने के लिए सियासी लोग मोहब्बत के पैगाम के साथ वोट माँगा करते थे ,अदालतें इंसाफ किया करती थी ,अदालतों में तथ्यों और क़ानून के हिसाब से फैसले हुआ करते थे ,जजों की नियुक्ति ,,कॉलिजेनियम में सियासत नहीं ,विशिष्टता विशेषग्यता होती ,,थी ,,इसीलिए अदालतें संस्कृति ,जज़्बात ,धर्म ,मज़हब की रिवायतों ,खुशियों पर पानी पर पाबंदियां नहीं लगाया करती थी ,संविधान सभी धर्मों को त्यौहार बनाने की इजाज़त देता है ,दीपावली हमारा किसी धर्म का नहीं हमारे राष्ट्र का पर्व है ,सभी जानते ,है किताबों में पहले पढ़ाया जाता ,था दीपावली के दीप मोहब्बत बांटते है ,रौशनी बांटते है ,जबकि बदलते मौसम में जब पटाखे फूटते है ,तो बिमारियों से ग्रस्त करने वाले कीटाणुओं का इन पटाखों के धुए और धमाके से नाश होता है ,,लेकिन दोस्तों पर्यावरण विभाग ,,मोटर विभाग सहित सरकारी हथकंडों ने अब बचपन के स्कूलों में पढ़ाये जाने वाले दीपावली के उस पाठ के मतलब ही बदल दिए है ,पर्यावरण विभाग निकम्मा है ,,सरकार मोटरविभाग से ,मोटर उत्पादकों से ,पर्यावरण संरक्षण संतुलित करवा पाने में करोड़ों खर्च के बाद भी निकम्मी साबित हुई ,है ,तो इसमें दीपावली का क्या क़ुसूर है ,,दीपावली तो पहले भी खुशियों से बनती थी अभी भी खुशियों से ,मनेगी ,,पहले के जो लेखक ,,जो चिंतक ,,जो क़ानूनविद थे उन्होंने दीपावली का जो पाठ किताबों में लिखा है पढ़ाया है ,उसे भगवान की मर्ज़ी कहते है ,,और भगवान की मर्ज़ी ,अल्लाह के इनाम को दुनिया की कोई अदालत बदल नहीं सकती है जनाब ,,तो आज यह अदालतें जो खुद अपनी अदालतों में सरकार से जज ,,बैठने की पर्याप्त व्यवस्था के लिए विधिक ,आधिकारिक ,,संघर्ष करने में नाकाम रही है ,वोह अदालतें पटाखे कैसे फूटेंगे ,कब फूटेंगे ,,कितने फूटेंगे इस पर फैसला देते है,,, तो अजीब सा लगता है ,,वोह भी उन निकम्मे प्रदूषण अधिकारीयों की रिपोर्ट पर ,, जो लाखों करोडो रूपये की तनख्वाह ,सुविधाये लेकर भी फैक्ट्रियों ,वाहनों ,और दूसरी तरह के प्रदूषण को रोक नहीं पाते ,हरे पेड़ काटने ,वनों ,,खेती की ज़मीनो को बर्बाद होने से नहीं बचा पाते ,प्रदूषण नियंत्रण सरकार की ज़िम्मेदारी है ,लेकिन आस्थाओ से खिलवाड़ ,,सिर्फ होली दीपावली पर प्रदूषण का पाठ बंदिशे अजीब सी लगती है वोह भी संविधान के दायरे के बाहर जाकर अगर ऐसी बंदिशें हो तो ऐसे कुशासन से नफरत सी होने लगती है ,,प्रदूषण ,पर्यावरण संतुलन के लिए जंगल गायब हो रहे है ,रिसोर्ट ,शहरीकरण ,अय्याशियों के फॉर्म हाउस के नाम पर भ्रष्ट नेताओं के जो खेल है ,उन्हें हरे पेड़ काटने से कभी नहीं रोका ,वन की ज़मीन पर वन उजाड़ने पर कोई पाबंदी ,नहीं ,,ऐसे में अगर दीपावली पर पटाखों की दीप जलाने की पाबंदियां लगती है तो अफ़सोस होता है ,,गुस्सा आता है ,और ऐसे क़ानून ,ऐसे आदेश ,,ऐसे क़ायदे के खिलाफ बगावत होती है ,,शायद आप भी ऐसा ही सोचते है ,दोस्तों हम मोहब्बत से ऐसा पैगाम दे ,के अगली दीपावली पर किसी अदालत ,किसी सरकारी इदारे की इतनी हिम्मत न हो के वोह बाराह महीने अपने निकम्मेपन नाकारापन की होली ,,दीपावली ,ईद ,बकराईद ,,सहित सभी मज़हबों के त्योहारों पर पाबंदी के साथ ,,दे ,,इसीलिए कहते है मिलकर रहो ,टूटोगे तो बिखर जाओगे ,मिलकर रहोगे तो जो तुमसे टकराएगा वोह चूर चूर हो जाएगा ,,दीपावली की एक बार फिर सभी को मुबारकबाद ,बधाई ,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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