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12 अगस्त 2018

आज़ादी के पहले आंदोलन के जांबाज़ सिपाही लाला जयदयाल ,उनके भाई हर दयाल ,,महराब खान ,,उनके भाइयों के जांबाज़ क़िस्से दबा ,दिए गए

आज़ादी का जश्न ,,आज़ादी की यात्राएं ,,,जिसमे सियासत भी है ,जिसमे जज़्बा भी है ,राष्ट्रीयता भी है ,,प्रशासनिक मजबूरियां ,अखबारी विज्ञापन ,मीडिया विज्ञापन की ख़ुशी भी है ,स्वतंत्रता आंदोलन पर लिखने वाले लेखकों के हौसले भी है ,कोटा में आज़ादी की जंग के बेहिसाब जांबाज़ सिपाहियों के क़िस्से भी है लेकिन अफ़सोस देश की आज़ादी के पहले आंदोलन के जांबाज़ सिपाही लाला जयदयाल ,उनके भाई हर दयाल ,,महराब खान ,,उनके भाइयों के जांबाज़ क़िस्से दबा ,दिए गए है ,,छुपा दिए गए है ,अंग्रेज़ों के लाटसाहब के सिपाहियों से जंग लड़कर उनके रेसीडेंसी हाउस में घुसकर ,,अंग्रेज़ों के क़त्ल ऐ आम ,उनकी गुलामी का बदला लेकर कोटा को अंग्रेज़ो से आज़ाद कराकर पहली बार अपने क़ब्ज़े में लेने वाले यह जांबाज़ सिपाही ,महराब खान ,,लाला जय दयाल कोन थे ,किन गद्दारों की वजह से कोटा फिर गुलाम बना ,अंग्रेज़ों के हाथों में फिर कोटा को गुलाम बनाकर क्यों सौंपा गया ,,इन जांबाज़ सिपाहियों को फिर गिरफ्तार कर कहाँ किसलिऐ फांसी दी गयी यह दास्ताँ ,यह आज़ादी के दीवानो की सच्ची कहानियां ,इनके समाधि स्थल ,इनके शहादत स्थल ,क्या कोटा की जनता को ,आज के नोजवानो को जांनने का हक़ नहीं ,,क्या इन वीरगाथाओं को कोटा के स्कूली बच्चो की आज़ादी की कहानियों में कोर्स में पढ़ाया नहीं जाना चाहिए ,,,लेकिन अफ़सोस ऐसे जांबाज़ सिपाहियों के आज़ादी की जंग में प्राणों की आहुति देने वाले जानबाज सिपाहियों के क़िस्से दफ़न हो गए है ,,,जिसे प्रभावों में आकर लेखकों ने ज़मीन दोज़ कर दिए ,चंद ज़मीनो के टुकड़ों में कुछ लेखक कोटा में बिके भी और इन आज़ादी के दीवानो जांबाज़ कहानिया ,इतिहास बना दी गयी ,न इन आज़ादी के दीवानो का कोटा में कोई वुजूद रहता है ,न ही आज़ादी की जंग की कहानियों में आज़ादी के इन दीवानो को याद किया जाता है ,आखिर क्यों और केसा षड्यंत्र है इन आज़ादी के दीवानो की वीरगाथाओं ,इनकी शहादत के क़िस्सों को छुपाने के पीछे क्या षड़यत्र ,है क्या कोटा जानना नहीं चाहेगा ,,क्या विज्ञापन से अलग हटकर आज़ादी के ओरिजनल इन दीवानो को श्रद्धांजलि नहीं देना चाहिए ,,,दोस्तों सभी जानते है ,,,अंग्रेज़ों द्वारा कोटा को गुलामबनाकर संचालित भवन रेसीडेंसी हाउस पर इन ही जांबाज़ सिपाहियों ने कोटा को आज़ाद कराने के लिए बहादुरी से जंग लड़ी ,रेसीडेंसी हाउस पर क़ब्ज़ा किया ,,ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी ,,लेकिन फिर इन्हे मुखबिरी आधार पर ,,हराया गया ,फिर कोटा को गुलाम बनाया गया ,,फिर मुखबिरी व्यवस्था के तहत इन जांबाज़ सिपाहियों को गिरफ्तार किया गया ,अफ़सोस इन जांबाज़ सिपाहियों ,जिन्होंने ने कोटा के आत्मसम्मान ,,,कोटा के स्वाभिमान ,,कोटा की अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ादी के लिए फांसी की सजा पायी ,आज़ादी के पहले आंदोलन की कोटा से शुरआत कर ,इस जंग में आज़ादी की जंग के जज़्बे को पुरे देश मिसाल बनाकर पेश की ,आज देश भर में तो क्या ,कोटा के आज़ादी के आंदोलन के क़िस्सों में इनकी बहादुरी ,इनके प्राणों की आहुति ,इनकी फांसी की दास्ताँ ,,इनकी आज़ादी की बहादुरी की जंग ,,हाशिये पर आ गयी है ,,हमारे कोटा के जज़्बात को समझने वाले ,आज़ादी की जंग के सिपाहियों के प्रति ,,ईमानदाराना उन्हें इज़्ज़त देने का जज़्बा रखने वाला एक भी ईमानदार कोटा वासी ,,एक भी पत्रकार ,एक भी सियासी शख्स अगर है ,एक भी लेखक अगर है ,एक भी व्यक्ति ,आज़ादी के जश्न बनाने को ओरिजनल तरीके से बनाकर ,कोटा की आज़ादी की इस जंग ,शहीदों की इस जांबाज़ दास्तान को बताने वाला अगर है ,तो यक़ीनन ,,शायद भगत सिंह ,,सुभाषचंद्र बोस के क़िस्सों की तरह कोटा के आज़ादी के आंदोलन , कोटा के आज़ादी के दीवानो के इस जाबाज़ जज़्बे को देश सलाम करेगा , कोटा का गौरव बढ़ेगा ,,कोटा की आज़ादी की जंग के उन स्मारकों ,,उन स्थानों ,,जहाँ इनकी जंग हुई ,जहाँ इन्होने अंग्रेज़ों को भगाया ,,जहाँ इन्हे फांसी दी गयी ,सभी स्थानों की ,अहमियत पर्यटन दृष्टि से भी ,,ऐतिहासिक स्मारक की दृष्टि से भी यहां आवागमन बढ़ेगा ,,है कोई ईमानदार ,लेखक,,पत्रकार ,,मीडिया जर्नलिस्ट जो निष्कर्ष होकर बेबाकी से इस दास्ताँ को अगर ,,मगर ,किन्तु लेकिन परन्तु की भावना त्याग कर सिर्फ आज़ादी के कोटा के इन जाबाज़ दीवानों ,महराब खान ,सोहराब खान ,लाला जय दयाल ,लाला हरदयाल की बहादुरी के क़िस्से देश की हुकूमत तक पहुंचाए ,देश की आम जनता तक पहुंचाए ,,देखते है एक ब्रेक के बाद ,,,,,,,,,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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