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19 फ़रवरी 2016

काला कोट पहनने के लिए सीना चाहिए हूजूर !


आजकल वकीलों की गाहे बगाहे निंदा, आलोचना और उनके व्यवसाय पर टिप्पणीयों का दौर चल रहा है। वकीलों के विरुद्ध की गई मौखिक टिप्पणीयों को देश का मीडिया प्राय: बिना समुचित संदर्भ इस प्रकार से प्रचारित प्रसारित करता है कि देश के समूचे वकील समुदाय के प्रति लोगों के मन में हिकारत पैदा हो जाये। जबकि देश की मीडिया के विरुद्ध की गई किसी प्रकार की मौखिक टिप्पणीयों को नजरअंदाज किया जाता है।
आज देश का आम साधारण वकील कठोर संघर्ष व दबाब की स्थिति में है क्योंकि उसके कार्यस्थल पर उसके लिए न्यूनतम सुविधाओं तक का आभाव है, उसकी आर्थिक स्थिति और सुरक्षित भविष्य की तो बात ही क्या ! ऐसा क्यों ?
जब अदालत के बाबूओं तक के लिए बैठने व काम करने के लिए पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है तो वकीलों जिन्हें माननीय सुप्रीम कोर्ट ने "आफिसर आफ द कोर्ट" के विशेषण से नवाज रखा है को किसके भरोसे छोड दिया जाता है?
वकालत के व्यवसाय में और भी अधिक योग्य और प्रतिभाशाली लोग आने चाहिए मगर कैसे ? सच्चाई ये है कि देश के वकीलों को जिन विषम परिस्थितियों में काम करना पडता है उसके चलते देश के विभिन्न प्रतिष्ठित ला विश्वविधालयों के स्नातक काला कोट पहनने की बजाए किसी ए0सी0 आफिस की मोटी तनख्वाह लेना ज्यादा पसंद करते हैं वरना उन्हें एक वकील के रूप में एक पाई भी सरकार की और से ना मिले और ना ही किसी मूलभूत सुविधा की कल्पना ही की जा सकती है।
देश की अदालतों में जजों की भारी कमी व विभिन्न व्यवस्थागत खामीयों के कारण मुकदमों का निस्तारण लंबे समय तक नहीं हो पाता है जो कि वास्तव में तो देश की शासन व्यवस्था व संपूर्ण न्यायपालिका से जुडी समस्या है मगर अकेला वकील इस जबाबदेही को ओढ कर अपने मुवक्किलों के प्रति जबाबदेह बना हुआ है। उक्त प्रकार से सिस्टम की खामी को नकारात्मक रूप से वकीलों पर थोप दिया गया है और देश का वकील समुदाय बडे दिल के साथ इसे निभाता भी चला आ रहा है।
अगर वकीलों की न्यूनम सुविधाओं, खर्चों की व्यवस्था हो और न्यायिक प्रक्रियाओं में खामी को दूर कर तीव्र न्याय वितरण हो तो आम जन में बनाई गई वकीलों की नकारात्मक छवि समाप्त हो जायेगी।
मेरे विचार में अधीनस्थ अदालतों में नए वकीलों की स्थिति के बारे में देश के शीर्ष पदों पर बैठेे लोगों को कोई अंदाजा ही नहीं है।
इतिहास साक्षी है कि वकीलों ने अपनी परवाह किये बिना देशहित में खुद को झोंका है, गलत कानूनों, गलत व्यवस्था व गलत बात का हमेशा विरोध किया है। ऐसे में बजाए वकीलों के हित में सोचने के, व्यवस्थागत खामियों का ठिकरा येनकेन प्रकारेण वकीलों के सिर पर फोडना मेरे विचार में उचित नहीं है।

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