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24 जनवरी 2026

तू ही हमारा मालिक है न ये लोग (ये लोग हमारी नहीं) बल्कि जिन्नात (खबाएस भूत-परेत) की परसतिश करते थे कि उनमें के अक्सर लोग उन्हीं पर ईमान रखते थे

 तू ही हमारा मालिक है न ये लोग (ये लोग हमारी नहीं) बल्कि जिन्नात (खबाएस भूत-परेत) की परसतिश करते थे कि उनमें के अक्सर लोग उन्हीं पर ईमान रखते थे (41)
तब (खु़दा फरमाएगा) आज तो तुममें से कोई न दूसरे के फायदे ही पहुँचाने का इख़्तेयार रखता है और न ज़रर का और हम सरकशों से कहेंगे कि (आज) उस अज़ाब के मज़े चखो जिसे तुम (दुनिया में) झुठलाया करते थे (42)
और जब उनके सामने हमारी वाज़ेए व रौशन आयतें पढ़ी जाती थीं तो बाहम कहते थे कि ये (रसूल) भी तो बस (हमारा ही जैसा) आदमी है ये चाहता है कि जिन चीज़ों को तुम्हारे बाप-दादा पूजते थे (उनकी परसतिश) से तुम को रोक दें और कहने लगे कि ये (क़ुरान) तो बस निरा झूठ है और अपने जी का गढ़ा हुआ है और जो लोग काफि़र हो बैठो जब उनके पास हक़ बात आयी तो उसके बारे में कहने लगे कि ये तो बस खुला हुआ जादू है (43)
और (ऐ रसूल) हमने तो उन लोगों को न (आसमानी) किताबें अता की तुम्हें जिन्हें ये लोग पढ़ते और न तुमसे पहले इन लोगों के पास कोई डरानेवाला (पैग़म्बर) भेजा (उस पर भी उन्होंने क़द्र न की) (44)
और जो लोग उनसे पहले गुज़र गए उन्होंने भी (पैग़म्बरों को) झुठलाया था हालांकि हमने जितना उन लोगों को दिया था ये लोग (अभी) उसके दसवें हिस्सा को (भी) नहीं पहुँचे उस पर उन लोगों न मेरे (पैग़म्बरों को) झुठलाया था तो तुमने देखा कि मेरा (अज़ाब उन पर) कैसा सख़्त हुआ (45)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तुमसे नसीहत की बस एक बात कहता हूँ (वह) ये (है) कि तुम लोग बाज़ खु़दा के वास्ते एक-एक और दो-दो उठ खड़े हो और अच्छी तरह ग़ौर करो तो (देख लोगे कि) तुम्हारे रफीक़ (मोहम्मद स0) को किसी तरह का जुनून नहीं वह तो बस तुम्हें एक सख़्त अज़ाब (क़यामत) के सामने (आने) से डराने वाला है (46)
(ऐ रसूल) तुम (ये भी) कह दो कि (तबलीख़े रिसालत की) मैंने तुमसे कुछ उजरत माँगी हो तो वह तुम्हीं को (मुबारक) हो मेरी उजरत तो बस खु़दा पर है और वही (तुम्हारे आमाल अफआल) हर चीज़ से खू़ब वाकि़फ है (47)
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि मेरा बड़ा गै़बवाँ परवरदिगार (मेरे दिल में) दीन हक़ को बराबर ऊपर से उतारता है (48)
(अब उनसे) कह दो दीने हक़ आ गया और इतना तो भी (समझो की) बातिल (माबूद) शुरू-शुरू कुछ पैदा करता है न (मरने के बाद) दोबारा जि़न्दा कर सकता है (49)
(ऐ रसूल) तुम ये भी कह दो कि अगर मैं गुमराह हो गया हूँ तो अपनी ही जान पर मेरी गुमराही (का वबाल) है और अगर मैं राहे रास्त पर हूँ तो इस “वही” के तुफ़ैल से जो मेरा परवरदिगार मेरी तरफ़ भेजता है बेशक वह सुनने वाला (और बहुत) क़रीब है (50)

23 जनवरी 2026

और जो लोग काफिर हों बैठे कहते हैं कि हम तो न इस क़ुरान पर हरगिज़ इमान लाएँगे और न उस (किताब) पर जो इससे पहले नाजि़ल हो चुकी और (ऐ रसूल तुमको बहुत ताज्जुब हो) अगर तुम देखो कि जब ये ज़ालिम क़यामत के दिन अपने परवरदिगार के सामने खड़े किए जायेंगे (और) उनमें का एक दूसरे की तरफ (अपनी) बात को फेरता होगा कि कमज़ोर अदना (दरजे के) लोग बड़े (सरकश) लोगों से कहते होगें कि अगर तुम (हमें) न (बहकाए) होते तो हम ज़रूर ईमानवाले होते (इस मुसीबत में न पड़ते

 और जो लोग काफिर हों बैठे कहते हैं कि हम तो न इस क़ुरान पर हरगिज़ इमान लाएँगे और न उस (किताब) पर जो इससे पहले नाजि़ल हो चुकी और (ऐ रसूल तुमको बहुत ताज्जुब हो) अगर तुम देखो कि जब ये ज़ालिम क़यामत के दिन अपने परवरदिगार के सामने खड़े किए जायेंगे (और) उनमें का एक दूसरे की तरफ (अपनी) बात को फेरता होगा कि कमज़ोर अदना (दरजे के) लोग बड़े (सरकश) लोगों से कहते होगें कि अगर तुम (हमें) न (बहकाए) होते तो हम ज़रूर ईमानवाले होते (इस मुसीबत में न पड़ते) (31)
तो सरकश लोग कमज़ोरों से (मुख़ातिब होकर) कहेंगे कि जब तुम्हारे पास (खु़दा की तरफ़ से) हिदायत आयी तो थी तो क्या उसके आने के बाद हमने तुमको (ज़बरदस्ती अम्ल करने से) रोका था (हरगिज़ नहीं) बल्कि तुम तो खु़द मुजरिम थे (32)
और कमज़ोर लोग बड़े लोगों से कहेंगे (कि ज़बरदस्ती तो नहीं की मगर हम खु़द भी गुमराह नहीं हुए) बल्कि (तुम्हारी) रात-दिन की फरेबदेही ने (गुमराह किया कि) तुम लोग हमको खु़दा न मानने और उसका शरीक ठहराने का बराबर हुक्म देते रहे (तो हम क्या करते) और जब ये लोग अज़ाब को (अपनी आँखों से) देख लेंगे तो दिल ही दिल में पछताएँगे और जो लोग काफिर हो बैठे हम उनकी गर्दनों में तौक़ डाल देंगे जो कारस्तानियां ये लोग (दुनिया में) करते थे उसी के मुवाफिक़ तो सज़ा दी जाएगी (33)
और हमने किसी बस्ती में कोई डराने वाला पैग़म्बर नहीं भेजा मगर वहाँ के लोग ये ज़रूर बोल उठेंगे कि जो एहकाम देकर तुम भेजे गए हो हम उनको नहीं मानते (34)
और ये भी कहने लगे कि हम तो (ईमानदारों से) माल और औलाद में कहीं ज़्यादा है और हम पर आख़ेरत में (अज़ाब) भी नहीं किया जाएगा (35)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मेरा परवरदिगार जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और (जिसके लिऐ चाहता है) तंग करता है मगर बहुतेरे लोग नहीं जानते हैं (36)
और (याद रखो) तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद की ये हस्ती नहीं कि तुम को हमारी बारगाह में मुक़र्रिब बना दें मगर (हाँ) जिसने ईमान कु़बूल किया और अच्छे (अच्छे) काम किए उन लोगों के लिए तो उनकी कारगुज़ारियों की दोहरी जज़ा है और वह लोग (बेहश्त के) झरोखों में इत्मेनान से रहेंगे (37)
और जो लोग हमारी आयतों (की तोड़) में मुक़ाबले की नीयत से दौड़ द्दूप करते हैं वही लोग (जहन्नुम के) अज़ाब में झोक दिए जाएंगे (38)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मेरा परवरदिगार अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और (जिसके लिए चाहता है) तंग कर देता है और जो कुछ भी तुम लोग (उसकी राह में) ख़र्च करते हो वह उसका ऐवज देगा और वह तो सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है (39)
और (वह दिन याद करो) जिस दिन सब लोगों को इकट्ठा करेगा फिर फरिश्तों से पूछेगा कि क्या ये लोग तुम्हारी परसतिश करते थे फरिश्ते अजऱ् करेंगे (बारे इलाहा) तू (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है (40)

22 जनवरी 2026

मानव सेवा ही ईश्वर सेवा का सर्वोच्च स्वरूप - बिरला*

 

मानव सेवा ही ईश्वर सेवा का सर्वोच्च स्वरूप - बिरला*
- श्री राम धर्मार्थ चिकित्सालय का 31वाँ वार्षिकोत्सव
के डी अब्बासी
कोटा, 22 जनवरी। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला गुरुवार को कोटा में श्री राम धर्मार्थ चिकित्सालय के 31वें वार्षिकोत्सव समारोह में सम्मिलित हुए। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन सेवा, मर्यादा, नैतिकता और समर्पण का आदर्श है, और यही मूल्य इस चिकित्सालय की कार्यप्रणाली में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। बीते तीन दशकों से यह संस्थान मानव सेवा को ईश्वर सेवा मानकर निस्वार्थ भाव से चिकित्सा सेवाएँ प्रदान कर रहा है, जो समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि श्री राम धर्मार्थ चिकित्सालय की पहचान यह है कि यहाँ जाति, वर्ग या आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर हर जरूरतमंद को उपचार और संवेदना मिलती है। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा का मूल भाव सेवा है, और मंदिर, चिकित्सालय व अन्न सेवा जैसे कार्य इसी परंपरा को जीवंत रखते हैं। प्रभु श्रीराम का जीवन केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि नैतिक जीवन और कर्तव्यबोध का मार्गदर्शक है।
बिरला ने कहा कि कोविड काल में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों ने कठिन परिस्थितियों में अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों के प्राण बचाए जो भारत की मानवीय शक्ति और सेवा भाव का सच्चा उदाहरण है, जिससे देश की प्रतिष्ठा विश्व स्तर पर सुदृढ़ हुई है।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि आने वाले समय में कोटा चिकित्सा सेवाओं के क्षेत्र में और अधिक सशक्त केंद्र के रूप में उभरेगा। सरकार, समाज और संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों से आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ, निःशुल्क उपचार तथा मरीजों और उनके परिजनों के लिए भोजन व विश्राम के लिए रामाश्रय जैसी व्यवस्थाएँ विकसित की जा रही हैं, जिससे कोटा मेडिकल टूरिज्म के रूप में भी अपनी पहचान बनाएगा।

“हड्डी टूटेगी ही नहीं” मंत्री का मज़ाकिया बयान चूर-चूर

 

“हड्डी टूटेगी ही नहीं” मंत्री का मज़ाकिया बयान चूर-चूर
कलश यात्रा में भगदड़ से 70 वर्षीय वृद्धा की हड्डी टूटी, मधुमक्खी हमले में 5 युवतियाँ घायल
रामगंजमंडी।धार्मिक आस्था के नाम पर आयोजित भव्यता, हकीकत में प्रशासनिक अराजकता और मंत्री की गैरजिम्मेदार बयानबाज़ी का जीवंत उदाहरण बन गई। कृषि उपज मंडी समिति परिसर में पंडित धीरेन्द्र शास्त्री की रामकथा के लिए निकाली गई कलश यात्रा अव्यवस्थाओं के चलते हादसों में तब्दील हो गई।
कलश वितरण के दौरान मची अफरा-तफरी और भगदड़ में धुलेट निवासी गंगाबाई (70 वर्ष) गिर पड़ीं। नतीजा कूल्हे की हड्डी टूट गई। वृद्धा दर्द से तड़पती रही और रामगंजमंडी जिला चिकित्सालय से कोटा रेफर कर दी गई। यही नहीं, ओवरब्रिज पर अचानक मधुमक्खियों के झुंड ने महिलाओं पर हमला कर दिया, जिससे शीतल, रेनू, पल्लवी, प्रियंका व योगिता घायल हो गईं।
सबसे गंभीर और चौंकाने वाली बात यह है कि हादसे से महज एक दिन पहले आयोजित पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार ने शिक्षा एवं पंचायत राज मंत्री मदन दिलावर से बड़े धार्मिक आयोजन को देखते हुए हड्डी रोग विशेषज्ञ की तैनाती की मांग की थी।इस पर मंत्री ने जिम्मेदारी लेने के बजाय हँसते हुए कहा था “हड्डी टूटेगी ही नहीं।”
लेकिन मंत्री का यह दावा 24 घंटे भी नहीं टिक पाया।कलश यात्रा के दौरान ही वृद्धा की हड्डी टूट गई और मंत्री का बयान जनता के जख्मों पर नमक बन गया।
पहले मज़ाक, फिर मजबूरी
हादसे के बाद जब सवाल उठे और किरकिरी हुई, तब जाकर जिला मुख्य चिकित्साधिकारी को मजबूरी में सभा स्थल पर तीन दिनों के लिए हड्डी रोग विशेषज्ञ तैनात करना पड़ा।सवाल यह है कि यदि हादसा नहीं होता तो क्या प्रशासन यूँ ही सोया रहता?धार्मिक आयोजन या प्रशासनिक तमाशा?हजारों की भीड़ के बावजूद भीड़ नियंत्रण शून्य,चिकित्सा व्यवस्था अधूरी,आपदा प्रबंधन नदारद,धार्मिक आयोजन में श्रद्धालु भगवान के भरोसे छोड़ दिए गए, जबकि मंत्री कैमरे के सामने हँसी-मज़ाक करते रहे।हादसे के लिए कौन जवाबदेह है?क्या किसी की जान चली जाती, तब भी यही जवाब होता?आस्था के नाम पर लापरवाही और सत्ता के घमंड का यह नज़ारा रामगंजमंडी की जनता लंबे समय तक नहीं भूलेगी।

पोते ने प्रेरित किया तो,संपन्न हुआ नेत्रदान

 पोते ने प्रेरित किया तो,संपन्न हुआ नेत्रदान

हाडोती समाज में शाइन इंडिया फाउंडेशन,पिछले काफी समय से देश के अलग-अलग विश्वविद्यालय के छात्रों को समाज सेवा में निशुल्क इंटर्नशिप कराती है । इसी इंटर्नशिप में थोड़े समय पहले महावीर नगर तृतीय निवासी पुलकित अग्रवाल ने भी भाग लिया था, इस दौरान उन्होंने नेत्रदान की कार्यशालाओं के आयोजन के साथ-साथ घर, परिवार,दोस्तों और रिश्तेदारों के नेत्रदान संकल्प पत्र भी भरवाये थे।

पुलकित वर्तमान में देहरादून के एक निजी कॉलेज में अध्ययन कर रहे हैं, दादी मां अयोध्या देवीके निधन की सूचना जैसे ही उन्हें मिली, उन्होंने तुरंत अपने पिता गजेंद्र और ताऊ जी नवीन अग्रवाल को दादी मां के नेत्रदान करवाने के लिए समझाया ।

अयोध्या ने स्वयं ने अपनी इच्छा से प्रेरित होकर  नेत्रदान का संकल्प पत्र भरा हुआ था,इसीलिये बेटे नवीन,गजेंद्र और बेटियों शारदा,चंदा,हेमंत ने भी तुरंत ही नेत्रदान का निर्णय ले लिया । सभी की सहमति से निवास स्थान पर नेत्रदान की प्रक्रिया शाइन इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से संपन्न हुई।

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