पटना। न कोई पंडित न पुरोहित। न पोथी न मंत्रोजाप। न ही कोई
आडंबर। सिर्फ और सिर्फ आस्था। आस्था का चार दिनी यह महापर्व छठ खास मायने
रखता है। सूर्य की उपासना के इस पर्व के दौरान क्राइम नहीं होता। महिलाएं
खुद को कहीं ज्यादा महफूज मानती हैं। मुहल्लों की साफ-सफाई में सार्वजनिक
योगदान सामाजिक जीवन में रिश्तों की गरमाहट बिखेर देता है। लोक आस्था का यह
अद्भुत नजारा रूढ़ियों पर चोट करता हुआ लगता है।
शनिवार को नहाय-खाय के साथ ही इस महापर्व की शुरुआत हो जाएगी। ऐसी मान्यता
थी कि इस पर्व को केवल महिलाएं ही करती हैं पर अब पुरूष भी करने लगे हैं।
हालांकि पौराणिक मान्यता यह भी है कि भगवान सूर्य के पुत्र कर्ण ने
सूर्योपासना की थी। वह अंग प्रदेश के राजा था। अंग प्रदेश बिहार के मुंगेर
में माना जाता है। इस पर्व को लेकर अनेक तरह की मान्यताएं हैं। सूर्य की
उपासना कर उनसे विनती की जाती है कि वे धरती को हमेशा ऊर्जावान व गतिशील
बनाये रखें। पेड़-पौधों और सभी तरह के जीव-जंतुओं पर उनकी ऊर्जा का प्रवाह
बना रहे। यह भी मान्यता है कि छठ करने वाले सभी प्रकार खासकर सफेद दाग जैसी
बीमारियों से मुक्त हो जाते हैं।