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08 मार्च 2017

कनोकती ,,, ,,गागर में सागर ,भरने वाली , नयी ,साहित्यिक शेली के जनक साहित्यकार ,,अतुल कनक

कनोकती ,,, ,,गागर में सागर ,भरने वाली , नयी ,साहित्यिक शेली के जनक साहित्यकार ,,अतुल कनक लिखते है
नहीं भेजूँगा कोई संदेश
गुनगुनाऊँगा नहीं कोई प्रेमगीत तुम्हारी मनुहार में
घुँघरुओं में नहीं गूँथूँगा लय कोई तुम्हारी मनुहार की
तुम्हें कसम कि प्रतीक्षा मत करना बाँसुरी पर बजते राग पूरिया धनाश्री की/
तुमने कहा कि तुम्हें समझ नहीं आता कविताओं में लिखा प्रणय निवेदन
तो लो आज इसी असमझ के हवाले कर देता हूँ सृष्टि के सभी प्रबंध काव्य
तुम मत बाँचना कभी इन्हें इठलाते हुए- वैसे ही
जैसे कमरा बंद करके तुमने देर तक बाँचा था वो खुशबू भरा कागज
जिस पर तुम्हारे नाम के अलावा और कुछ भी नहीं लिखा था मैंने... यह चन्द पँक्तिया ,भाई अतुल कनक ने ,,ज़िद्दी ,,नाराज़ प्यार की संवेदना के नाम लिखी ,है ,,इन दिनों वोह चन्द अल्फ़ाज़ों में ,,गागर में सागर भर ,,,एक दर्शन ,,एक विचार ,,सिर्फ उनके द्वारा लिखित ,,कनोकती में भर देते है ,,,दोस्तों मेरे भाई ,,साहित्य सहेली में अतुल्य ,,सो टका सोना ,,,अतुल कनक ,, जिसके बोलने ,,चलने ,,उठने ,,बैठने ,,खान ,,पान ,,रहन सहन ,,व्यवहार में साहित्य सिर्फ साहित्य ,,ज्ञान ही ज्ञान है और ऐसी शख्सियत का जन्म,,, चाहे चंबल के किनारे,,, शिक्षा नगरी कोटा में हुआ हो,,, लेकिन यह शख्सियत,,, पुरे भारत की साहित्यिक धरोहर है ,,अनमोल है ,,इस साहित्यिक धरोहर को ,,,,लेखक ,,चिंतक सो टका साहित्यिक ,,,सोना कहते है ,,,जो अकूत है,,, जिसे तोला नहीं जा सकता ,,,,जी हां,,, मेरे भाइयों ,,,में बात कर रहा हूँ ,,,मेरे भाई प्रख्यात साहित्यकार ,,,अतुल कनक की ,,,जैसा नाम वैसा काम,,, कनक यानी सोना ,,,वोह भी सो टका सोना और अतुल यानी ,,,जिसे तोला नहीं जा सकता ,,मेरे यह दोस्त ,,साहित्य और आदर्श जीवनशैली में ,,,कुछ ऐसा ही मुक़ाम रखते है ,,,,,16 फ़रवरी 1967 में,,,, कोटा की धरती पर,, इनका जन्म तो हुआ,,, लेकिन,,, अतुल कनक,,, साहित्य की ऐसी पैदायश है,,, जिन्हे अभिमन्यु भी,,, कहा जा सकता है ,,चक्रव्यूह में हारने वाला,, अभिमन्यु नहीं ,,,जीतने वाला अभिमन्यु,,, इन्हे कहा जाता है ,,क्योंकि ,,,साहित्यिक विधा ,,इन्हे विरासत में मिली है ,,वोह भी गर्भ से ही,,, इनकी माता प्रसिद्ध साहित्यकार,, श्रीमती प्रेम लता जैन ,,,जब लिखती थी ,,साहित्य जीती थी तब,, यह गर्भ से ही,,, साहित्यकार के ज्ञानी हो गए ,,,,,इनके बुज़ुर्ग कहते है के,, अतुल के बचपन में रोने ,,खेलने ,,,बोलने ,,शैतानी के हर अंदाज़ में ,,,हास्य ,,व्यंग्य ,,अपनी बात का खूबसूरत प्रस्तुतिकरण, अंदाज़ से ही,, भविष्यवाणी थी के यह बच्चा ,,साहित्य जगत का एक बढ़ा हस्ताक्षर बनेगा ,,और हुआ भी यही ,,इनका जो कुछ भी लेखन है,, वोह मौलिक है ,,जो चिंतन है ,,वोह मौलिक है ,,सारगर्भित है ,,ज्ञानवर्धक है ,,,,अतुल कनक ,,राष्ट्रीय कवि ,,,,राष्ट्रिय साहित्यकार है ,,लेकिन इन्होेंने अपने मित्रो से ,,,प्यार का अन्दाज़ नहीं बदला ,,राजस्थान ,,कोटा और यहां की संस्कृति का प्यार,,, इनका कम नहीं हुआ ,,,हाड़ोती भाषा ,,क्षेत्रीय भाषा ,,राजस्थानी भाषा ,,इनके साहित्य की रीढ़ रही ,,इन्हें कई पुरस्कारों से इन्हे नवाज़ा गया ,,,,अतुल कनक को ,,इनकी पुस्तक ,,,,जूंण जातरा ,,के लिए पुरस्कृत किया गया ,,,,इनका लेखन तीन दशक से भी ज़्यादा समय से,, बदस्तूर जारी है ,,,भारत का कोई अख़बार ,,कोई मेगज़ीन ,,कोई टी वी चैनल ,,,ऐसा नहीं ,,,जिसमे इनके साहित्य की प्रतिभा,,, लोगों तक नहीं पहुंची हो ,,यह एक दार्शनिक ,,,चिंतक ,,विचारक भी है ,,,इनके अंदर ,,जानकारियों का खज़ाना है ,जिसे यह बात ही बात में ,,हास्य व्यंग्य के पारिवारिक मनोरंजक अंदाज़ में ,,,कहकर दुश्मनो को भी ,,अपना दोस्त बनाने का हुनर रखते है ,,जब यह बोलते है ,,जब यह लिखते है तो,,, इन्हे मंत्र मुग्ध होकर,,, पढ़ने और सुनने के अलावा ,,,हमारे पास कोइ दूसरा ,,,विकल्प नहीं रहता है ,,,,कोटा के अख़बारों में ,,अंग्रेजी के अख़बारों में ,,मेग्ज़ीनो में ,,इन्होेंने खूब लिखा है ,,साहित्यिक ऐतिहासिक लेखन की भी इनकी,, अलग विधा है ,,अलग अंदाज़ है ,,,यह कवि सम्मेलनों में,,, जब डूबता हुआ कवि सम्मेलन हो,,, तब भी इस निष्क्रिय और उबाउ कवि सम्मेलन को,,, अपने सफल संचालन से,,, यादगार बनाने का हुनर रखते है ,,,,,इनका अंदाज़ देखिये ,,मेने इनसे कुछ जानकारी चाही ,,मेरा लालच था मुझे इस बहाने इनकी कुछ ,,ज्ञानवर्धक प्रकाशित पुस्तके पढ़ने को मिल जाएंगी लेकिन इनका जवाब कुछ इस खूबसूरत साहित्यिक अंदाज़ में मिला,, जो इनकी साहित्यिक और नेकनीयती विधा का दर्शन है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,भैया बहुत मामूली सा आदमी हूँ । 12 साल की उम्र से कोशिश कर रहा हूँ कि कुछ सार्थक सृजन कर सकूँ। अभी तक कक्का बारहखड़ी ही सीख सका हूँ,,,,ये तो लोगों का बड़प्पन है ,,कि प्यार से पढ़ते सुनते हैं और सराह देते हैं ,इन्होंने रिसर्च स्कॉलर के रूप में थीसिस पूरी लिखी ,,,लेकिन गाइड के एक संवाद ने ,,,इतना आहत किया कि तैयार थिसिस प्रस्तुत नहीं की,,, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड,,,, राजस्थान और वर्द्धमान महावीर विश्व विद्यालय के,,, राजस्थानी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता हूँ,,,सबसे बड़ा सुख यह है कि साहित्य सेवा ने,,, कुछ बहुत अच्छे मित्र,,,, कुछ बहुत अच्छे अनुभव और लोगों का ढेर सारा प्रेम मिलाहै,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,फिर इनका परिचय आखिर लिखने के लिए इनकी आँखों के सुरमे से चुराना पढ़ा ,,इनका ।नाम : अतुल कनक,,,,,,,,,,,,,,,जन्म : 16 फरवरी 1967 शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी, अंग्रेजी, इतिहास) एम.बी.ए. (जारी)
पुस्तकें : पूव्र्या (हिन्दी नवगीत संग्रह), आओ, बाताँ कराँ (राजस्थानी कविताएं), चलो, चूना लगाऐं (हिन्दी व्यंग्य), जूण जातरा(राजस्थानीउपन्यास) और मगन धूळी (अनुवाद)प्रकाशन हिन्दी, अंग्रेजी और राजस्थानी में सात हजार से अधिक रचनाएं प्रकाशित पता : 3 ए 30, महावीर नगर-विस्तार, कोटा- राजस्थानफोन : 0744 2470160, 09414308291
e-mail: atulkanak@yahoo.com , atulkanak@gmail.com
Blogs: www.vyangyavagairah.blog.co.in , www.atulkanak.co.in हाल ही में इनकी लिखित रचना के कुछ अंश ,,,,,तितलियाँ लुभाती हैं अब भी तो दौड़ो तितलियों के पीछे दोनों बाँह फैलाये/ मालूम होने दो तितलियों को कि कायम है उनका जादू/कि शहर की सड़कों पर आते ही
अपने प्रेमी की प्रतीक्षा में अधेड़ हो चुकी लड़की की तरह उदास रहने लगी हैं तितलियाँ..,,इनका एक संदर्भित शेर ने तो मुशायरा ही लूट लिया ,,,बेकल- बेकल, गुमसुम-गुमसुम, तन्हा- तन्हा बैठे हो, मैं तो माना दीवाना हूँ, लेकिन तुम क्यों ऐसे हो...यह उत्साहवर्धन करते हुए लिखते है ,,.नहीं बदलता कुछ कभी
रोने से तो हरगिज़ नहीं बदलता/
लिखने दो अपनी सामथ्र्य को चुनौतियों के सीने पर उपलब्धियाँ
गूँजने दो हवाओं में अपने संकल्पों के गीत
बहने दो नदी की देह पर दीपक उद्दाम उमंगों के उत्सव के/
फिर देखना जिन्होंने षड्यंत्र रचे हैं तुम्हारे आँखों में खारा पानी उँडेलने के
वो ही दौड़े आऐंगे तुम्हारे अस्तित्व का अभिेशक करने/
कि रोने से सचमुच/कभी कुछ भी नहीं बदलता.......,,,,,,,,,,,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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